लोहता में अलम सददा की जियारत तो रिज़वी हाउस में ख़्वातीन का मातम
dil india live (Varanasi). 7 moharram को शहर भर अनेक आयोजन कर्बला के शहीदों की याद में आयोजित हुआ। इस मौके पर चौहट्टा लाल खां से सातवीं मुहर्रम मंगलवार को मेंहदी, ताबूत, अलम और दुलदुल का कदीमी जुलूस परम्परागत तरीके से निकाला गया। इस जुलूस में विभिन्न अंजुमनों ने नौहाख्वानी व मातम का नज़राना पेश किया। उधर बड़ागांव में मजलिस को मौलाना सैयद शकिर इमाम गाजीपुरी ने खिताब करते हुए कर्बला के मसायब बयान किया। इसके बाद जुलुस मरहूम सैय्यद अब्बास हुसैन के इमामबाड़े से निकला। जुलूस में शामिल महेंदी, अल्लम, दुलदुल संग सैकड़ों लोग नौहाख्वानी व मातम करते हुए चल रहे थे।
जुलूस अपने कदीमी रास्तों से होता हुआ अब्बासिया मस्जिद स्थित कर्बला एवं गंजे शहीदा पर पहुंचा जहां रौजे पर सलामी देकर पुनः इमामबाड़े पहुंच कर समाप्त हुआ। जुलुस में रास्ते भर नगर की विभिन्न अंजुमानों ने नौहाख्वानी, मातम किया। जुलूस में मुख्य रूप से सैयद अबूल हसन, सैयद जफरूल हसन, आरिफ, जेमी, प्रिन्स, अम्मार, बादशाह हुसैन, खुशीद हुसैन, जिशान हुसैन, मोहम्मद दानिश, कमरुल हसन, रूमान हुसैन आदि शामिल थे।
इसी क्रम में चौहट्टा लाल खां स्थित अजाखाना मोहतमिम कासिम का प्राचीन जुलूस देर रात्रि में निकाला गया। जुलूस निकलने से पूर्व मजलिस को डाक्टर शफीक हैदर ने खिताब किया। जुलूस में अंजुमन आबिदिया ने दर्द भरा नौहा पढ़ा जिसे सुनकर अकीदत मंदों की आंखे नम हो गयी। गमें शब्बीर क्या-क्या है, इसे बिस्मिल समझते है, कहानी कर्बला वालों की अहले दिल समझाते है। जुलूस में इस्लाम एण्ड पाटी ने शहनाई पर मातमी धुन प्रस्तुत की। ऊंट, बैण्ड बाजा और ताशा, ढोल से जुलूस का आकर्षण बढ़ गया। अकीदत मंद महिलाओं, पुरुष और बच्चों का हुजूम देर रात्रि तक जमा रहा। मेंहदी का जुलूस अपने कदीमी रास्तो इमामबाड़ा मीरघुरा होता हुआ सदर इमामबाड़ा लाट सरैया जाकर समाप्त हुआ। रास्ते भर अकीदतमंदो ने दुलदुल को दूध पिलाया और मन्नते व मुराद मानी। जुलूस में विभिन्न अंजुमनों ने नौहाख्वानी, मातम किया।
कदीमी बाल का हुआ मातम, जुटी ख़्वातीन
सातवीं मुहर्रम मंगलवार को पूर्वाहन १२ बजे शेख सलीम फाटक स्थित रिज़वी हाउस पर खातूनों महिलाओं ने कदीमी बाल का मातम किया और मन्नत मांगा। इस दौरान मजलिस को सम्बोधित करती हुई मोहतरमा नुजहत फरमान ने कहाकि हजरत इमाम हुसैन हजरत इमाम के भतीजे हजरत कासिम जो इमाम हसन के १३ वर्षीय पुत्र पुत्र थे, जिनका अकद इमाम हुसैन की बेटी फातिमा कुबरा से हुआ था और वे कर्बल की जंग में शहीद हो गये थे। यजीदों ने खैमें में आग लगा दी, लाशे इमाम हुसैन पामाल किया। उनकी लाश कर्बला की जलती रेत पर चालीस दिनों तक बेगोरों कफन रही। नन्हें अली असगर को शहीद कर दिया गया। शामे गरीबा आ गयी, कर्बलावालों ने सब कुछ बर्दाशत किया। आज यही वजा है कि सारी दुनिया में हुसैन का नाम याद किया जाता है ओर यजीद जिंदा रहकर मुर्दाबाद हो गया। हुसैन शहीद होकर कयामत तक लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे। हुसैन कल भी जिंदाबाद थे, आज भी जिन्दाबाद है। मोतरमा नुजहत फरमान ने कहाकि लाखों रौजे है जहां में हजरते अब्बास के ऐ यजीदों बेहया तेरा ठिकाना है कहां, सारे मसलक की किताबों को उठाकर देख लो, कर्बला सा वकेया दुनिया में मिलता है कहां।
इस मौके पर या हुसैन-या हुसैन... की सदा आने लगी। मजलिस में शामिल सैकड़ों महिलाओं की आंखों से आंसू छलक पड़े। मजलिस के बाद अंजुमन हैदरी निस्वां ने प्रभावशाली नौहा पढ़ा और बाल का मातम किया गया और कर्बला के मंजर को दर्शाया गया। नौहे के बोल कुछ इस तरह थे ये पुकारे रन में असगर वे जुबान वे जुबानी, कोई तुम में है मुसलमां जो पिला दे मुझको पानी, मैं हुसैन का हूं बेटा और हसन का हूं भतीजा, मेरे जद रसूले वर हक मैं अली की हूं निशानी। सुनते ही दूर-दराज से आयी महिलाओं की आंखों से आंसुओं के एक-एक कतरे बहने लगे और कर्बला का मंजर याद आने लगे।
इस अनोंखे बाल के मातम और मजलिस को सुनने के लिए दूर-दराज से सैकड़ों की संख्या में गाजीपुर, जौनपुर, शाहगंज, आजमगढ़, मऊ, इलाहाबाद, मिर्जापुर, दुलाईपुर, बड़ागांव, रामनगर आदि जिलों से आयी हुई थी। जायरीनों में तबरुक (प्रसाद) का भी वितरण किया गया। उधर लोहता में अलम सददा का जुलूस निकाला गया। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच छोटे बड़े रंग-बिरंगे अलम सददा को देखने, अलम सददा की जियारत करने लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था।



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें