शिया ख़्वातीन ने तोड़ी चूड़ियां, हटाया साजो श्रृंगार, पहना काला लिवास
Varanasi (dil India live). 29 जिलहिज्जा को चांद का दीदार हो गया। चांद देखे जाने के साथ ही इस्लामी नये साल माहे मोहर्रम का आगाज़ हो गया। चांद देखे जाने का ऐलान सदर काजी-ए-शहर, ‘काजी-ए-शहर’ व इश्तेमाई रुइयते हेलाल कमेटी समेत तमाम चांद कमेटियों ने किया। ऐलान में कहा गया कि आज (16 जून) को मोहर्रम का चांद दिखाई दिया है। इसलिए मुहर्रम की 01 तारीख 17 जून को होगी और यौमे आशूरा 26 जून 2026 को मनाया जाएगा। उधर चांद के दीदार संग शिया अजाखाने सजा दिए गए। मजलिसे इस्तेकबालिया बनारस समेत पूर्वांचल के चंदौली, जौनपुर, मऊ, आजमगढ, बलिया, गोरखपुर व गाजीपुर आदि शहरों में शुरू हो गई।
दरअसल मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक साल का पहला महीना है। इसी महीने के साथ इस्लामिक नए साल की शुरुआत होती है। वैसे तो ये एक महीना है लेकिन इस महीने में मुसलमान खास तौर पर शिया मुसलमान पैगंबर मोहम्मद (स.) के नवासे इमाम हुसैन समेत कर्बला में शहीद हुए 72 वीरों की शहादत का गम मनाते हैं। सन 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के कर्बला में पैगंबर मोहम्मद (स.) के नवासे इमाम हुसैन को उनके 72 साथियों के साथ यजीदी सेना ने शहीद कर दिया था। मुहर्रम में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का शिया मुस्लिम गम मनाते हैं।
सुन्नी मस्जिदों में एक से दस मुहर्रम तक शहादतनामा व तकरीर होती है तो शिया मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत का जिक्र करते हैं। उनका गम मनाने के लिए मजलिसें करते हैं। मजलिसों में इमाम हुसैन की शहादत बयान की जाती है। मजलिस में तकरीर (स्पीच) करने के लिए ईरान से भी इंडिया में आलिम (धर्मगुरू) आते हैं और जिस इंसानियत के पैगाम के लिए इमाम हुसैन ने शहादत दी थी उसके बारे में लोगों को विस्तार से बताया जाता है। उधर लोगों ने एक दूसरे को इस्लामिक नये साल की मुबारकबाद दी। सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक और व्हाट्स एप पर इस्लामी हिजरी नये साल की मुबारकबाद लोग अपने अजीजों से शेयर कर रहे थे। हालांकि यह महीना अदब और एहतराम का भी है इसलिए नया साल बेहद सादगी के साथ मनाया जाता है।
शहर भर में हुई इस्तेकबालिया मजलिसे
आज मोहर्रम के चांद होते ही हर तरफ फिजा गमगीन हो गई। या हुसैन या हुसैन...की सदाएं फिजा में गूंजने लगी। हर तरफ इस्तकबाले अज़ा की मजलिसे हुईं व इमामबाड़ों में शमां रोशन किया गया और शरबत पर कर्बला के शहीदों की नजर हुई। शहर भर की 28 अंजुमनों ने नोहाख्वानी और मातम का आगाज़ किया। इस दौरान मजलिस में बताया गया कि यह वह महीना है कि जिसमें इमाम हुसैन ने अपने 71 साथियों के साथ इंसानियत को बचाने के लिए कुर्बानी पेश की।
इंसानियत के लिए मिसाल है शहादत-ए-हुसैन
इस्लाम की तारीख में मुहर्रम बड़े ही अकीदत, एहतेराम के साथ मनाया जाता है। इंसानियत के लिए शहादत-ए-हुसैन एक मिसाल है। मुहर्रम का चांद दिखाई देने के बाद तनवीर फातेमा ने कहा कि मुहर्रम पर 2 महीना 8 दिन ग़म मनाया जाता है। यही नहीं पूरे दो माह 8 दिन शिया समुदाय के लोग किसी भी खुशी में शरीक नहीं होते। चांद दिखाई देने के साथ ही इमाम बारगाह, अजाखानो, घरों में मजलिसों का सिलसिला शुरू हो गया।
फातेमा ने कहा कि इमाम हुसैन ने जो इन्सानियत की राह दिखाई है ,वही हक पर चलने की नेक राह है। इमाम हुसैन ने जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का पैगाम दिया, हुसैन ने जालिम का साथ नहीं दिया। इसीलिए आपको अपने 72 साथियों के साथ इतनी बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी, लेकिन यही कुर्बानी दीन को बचा ले गई, और उसी कुर्बानी की वजह से इंसानियत दुनिया में अभी भी जिंदा है। इमाम हुसैन का बलिदान सत्य, न्याय, धार्मिकता महान प्रेरणा है।
मोहर्रम के वाराणसी में प्रमुख जुलूस
हज़रत अली समिति के सदस्य सलमान हैदर ने पत्रकारों को जुलूस की डिटेल बताई। उन्होंने कहा कि बनारस शहर में कई जगह जुलूसों के रास्तों की परेशानियां हैं और प्रशासन से अपील की जाती है कि वह रास्तों की दुश्वारियां को दूर कराएं और सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं। उन्होंने बताया कि
- 17 जून (पहली मोहर्रम): सुबह 7 बजे से मजलिसें शुरू होंगी। दोपहर 3 बजे लाट सरैया इमामबाड़े में अलम और दुलदुल का जुलूस निकलेगा।
- 18 जून (दूसरी मोहर्रम): शिवपुर में रात 8 बजे जुलूस उठेगा। दोपहर 2 बजे उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के घर पर कदीमी मजलिस होगी।
- 19 जून (तीसरी मोहर्रम): सायं 5 बजे औसानगंज नवाब की ड्योढ़ी से और शिवाला से अलम का जुलूस निकलेगा।
- 20 जून (चौथी मोहर्रम): चौहट्टा लाल खाँ इमामबाड़ा से रात 8 बजे अलम व दुलदुल का जुलूस निकलेगा।
- 21 जून (पांचवीं मोहर्रम): गोविंदपुरा से अलम का जुलूस उठेगा, जिसमें उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के परिजन शहनाई पर मातमी धुन बजाएंगे।
- 22 जून (छठवीं मोहर्रम): विश्व प्रसिद्ध 40 घंटे का दुलदुल जुलूस कच्ची सराय (दालमंडी) से शाम 5 बजे उठेगा, जो शहर के अलग-अलग रास्तों से होते हुए 24 जून (8 मोहर्रम) की सुबह वापस आएगा।
- 24 जून (आठवीं मोहर्रम): चहमामा इमामबाड़े से रात 8:30 बजे अलम व तुर्बत का जुलूस निकलेगा।
- 25 जून (नवीं मोहर्रम): इमाम चौकों पर ताजिये रखे जाएंगे। रात में शिवाला से प्रसिद्ध दूल्हा का जुलूस निकलेगा और भोर में फातमान में अंगारों पर मातम होगा।
- 26 जून (दसवीं मोहर्रम - आशुरा): सुबह से शाम तक जंजीर और कमा का मातम करते हुए 26 अंजुमनों के जुलूस निकलेंगे जो लाट सरैया और फातमान जाकर खत्म होंगे। शाम को 'शामे गरीबां' की मजलिस होगी।
- 27 जून (ग्यारहवीं मोहर्रम): दिन में 11 बजे 'चुप का डंका' यानी लुटे हुए काफिले का जुलूस निकलेगा।
- 28 जून (बारहवीं मोहर्रम - तीजा): दोपहर बाद आलम और अखाड़े का जुलूस निकलेगा।



