Varanasi (dil India live)। इमाम हसन, इमाम हुसैन समेत शहीदाने कर्बला का तीजा आज 12 मोहर्रम को पूरी अकीदत के साथ मनाया जा रहा है। इस दौरान जहां अजाखानों व इमामबारगाहों में 12 वीं मुहर्रम पर फूल की मजलिसे होंगी वहीं घरों में फातेहा और नज़र दिलाकर लोगो में तबर्रुक तक्सीम किया जाएगा। इस दौरान चना, इलायची दाना, पान, डली और तेल पर फातिहा कराकर अकीदतमंद इमाम हुसैन व शहीदाने कर्बला को नजराना-ए-अकीदत पेश करेंगे। दोपहर बाद अलग-अलग इलाकों से अलम व अखाड़ों के जुलूस निकालेंगे। जुलूस के दौरान फन-ए-सिपहगरी का हैरतअंगेज प्रदर्शन भी होता है। बुजुर्ग व बच्चे भी बनेठी, लाठी आदि से अपने जौहर दिखाते हैं। भोजूबीर, अर्दली बाजार, नदेसर, जैतपुरा, छित्तनपुरा, चौहट्टा लाल खां, कोयला बाजार, बजरडीहा, नई सड़क, लल्लापुरा, पितरकुंडा, पीली कोठी, सदर बाजार, शिवाला, गौरीगंज, बजरडीहा, नयी सड़क, दालमंडी आदि क्षेत्रों से निकलने वाले अलम सद्दे के जुलूस दरगाह फातमान पहुंच कर ठंडे होंगे। जुलूस में युवा छोटे से लेकर बड़े बड़े अलम लेकर चलते हैं, जिन्हें गुब्बारे, फूल-माला, मोती व बिजली की आकर्षक झालरों से सजाया जाता है। इस दौरान एक समय ऐसा भी आता है जब नई सड़क चौराहे से दरगाहे फातमान तक तिल रखने की भी जगह नहीं रहती है। मुख्य मार्ग के दोनों ओर के मकानों की छतों व बरामदों पर महिलाओं व बच्चों की भीड़ उमड़ती है।
उधर, गौरीगंज से नन्हे खां के इमामबाड़े से दोपहर में अलम का जुलूस निकलेगा। इस जुलूस में शिवाला का अलम का जुलूस भी शामिल हो होगा। जुलूस में सैकड़ों लोग कलाम पेश करते हुए चलते हैं। जुलूस शिवाला घाट पहुंच कर ठंडा होगा।
Varanasi (dil India live). हज़रत इमाम हसन, हज़रत इमाम हुसैन समेत कर्बला के 72 शहीदों कि याद में शनिवार को मलीदे, शरबत और शिरनी कि मुस्लिम घरों, इमाम चौकों व इमामबाड़ों में फातेहा करायी गई। फातेहा कराने के बाद जहां लोगों में तबर्रुक तकसीम किया गया वहीं इमाम चौक और इमामबाड़ों पर अदब और एहतराम के साथ ताजिये बैठा दिए गए। ताजिया बैठते ही उसकी जियारत करने दोनों वर्ग के लोगों का हुजुम देर रात तक उमड़ा हुआ था।
9 वीं मोहर्रम को इमाम चौक पर सभी ताजिया फातेहा करके बैठा दी गईं। शहर भर में इनकी जियारत के लिए भारी भीड़ उमड़ी रही। जैतपुरा की बुर्राक की ताजिया, नईसडक की पीतल की ताजिया, लल्लापुरा की रांगे की ताजिया, गौरीगंज की शीशम की ताजिया, अर्दली बाजार की जरी के साथ ही चपरखट की ताजिया, मोतीवाली ताजिया, हिंदू लहरा की ताजिया, शीशे की ताजिया, मोटे शाबान की ताजिया, काशीराज की मन्नत की ताजिया व बड़ादेव मुहल्ले आदि प्रमुख ताजिया लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं। इस दौरान बच्चे आकषर्ण ताजिये के साथ सेल्फी भी लेते दिखाई दिए।
गश्ती अलम का निकला जुलूस
दूल्हे का जुलूस निकलने के बाद गश्ती अलम का जुलूस विभिन्न शिया इमामबाडों से निकाला गया जो गश्त करते हुए एक जगह से दूसरे जगह एक इमामबाड़े से होकर दूसरे इमामबाड़े तक गश्त करता दिखाई दिया। काले पोशाक में शिया वर्ग के लोगों ने इस जुलूस में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
न्याय के लिए संघर्ष करने वालों की अंतरात्मा में इमाम हुसैन आज भी है ज़िन्दा
ध्रुव गुप्त
Varanasi (dil india live). इस्लामी नववर्ष यानी हिजरी सन् के पहले महीने मुहर्रम की शुरुआत हो चुकी है। मुहर्रम का शुमार इस्लाम के चार पवित्र महीनों में होता है। जिसकी अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (स.) ने खुसूसियत बयां की है। इस पाक़ माह में रोज़ा रखने की अहमियत बयान करते हुए उन्होंने कहा है कि रमजान के अलावा सबसे अच्छे रोज़े वे होते हैं जो अल्लाह के लिए इस महीने में रखे जाते हैं। मुहर्रम के महीने के दसवे दिन को यौमें आशुरा कहा जाता है। यौमे आशुरा का इस्लाम ही नहीं, मानवता के इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह दिन है जब सत्य, न्याय, मानवीयता के लिए संघर्षरत हज़रत मोहम्मद (से.) के नवासे हुसैन इब्ने अली की कर्बला के युद्ध में उनके बहत्तर स्वजनों और दोस्तों के साथ शहादत हुई थी। हुसैन विश्व इतिहास की ऐसी कुछ महानतम विभूतियों में हैं जिन्होंने बड़ी सीमित सैन्य क्षमता के बावज़ूद आततायी यजीद की विशाल सेना के आगे आत्मसमर्पण कर देने के बजाय लड़ते हुए अपनी और अपने समूचे कुनबे की क़ुर्बानी देना स्वीकार किया था। कर्बला में इंसानियत के दुश्मन यजीद की अथाह सैन्य शक्ति के विरुद्ध हुसैन और उनके थोड़े-से स्वजनों के प्रतीकात्मक प्रतिरोध और आख़िर में उन सबको भूखा-प्यासा रखकर यजीद की सेना द्वारा उनकी बर्बर हत्या के किस्से और मर्सिया पढ़ और सुनकर मुस्लिमों की ही नहीं, हर संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम हो जाती हैं - कब था पसंद रसूल को रोना हुसैन का/आग़ोश-ए-फ़ातिमा थी बिछौना हुसैन का / बेगौर ओ बेकफ़न है क़यामत से कम नहीं / सहरा की गर्म रेत पे सोना हुसैन का !
मनुष्यता और न्याय के हित में अपना सब कुछ लुटाकर कर्बला में हुसैन ने जिस अदम्य साहस की रोशनी फैलाई, वह सदियों से न्याय और उच्च जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ रहे लोगों की राह रौशन करती आ रही है। कहा भी जाता है कि 'क़त्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद हैं / इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद।' इमाम हुसैन का वह बलिदान दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ही नहीं, संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। हुसैन महज़ मुसलमानों के नहीं, हम सबके हैं। यही वज़ह है कि यजीद के साथ जंग में लाहौर के ब्राह्मण रहब दत्त के सात बेटों ने भी शहादत दी थी जिनके वंशज ख़ुद को गर्व से हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं। हालांकि कुछ लोग हुसैनी ब्राह्मणों की शहादत की इस कहानी पर यक़ीन नहीं रखते।
इस्लाम के प्रसार के बारे में पूछे गए एक सवाल के ज़वाब में एक बार महात्मा गांधी ने कहा था - मेरा विश्वास है कि इस्लाम का विस्तार उसके अनुयायियों की तलवार के ज़ोर पर नहीं, इमाम हुसैन के सर्वोच्च बलिदान की वज़ह से हुआ। नेल्सन मंडेला ने अपने एक संस्मरण में लिखा है- क़ैद में मैं बीस साल से ज्यादा वक़्त गुज़ार चुका था। एक रात मुझे ख्याल आया कि मैं सरकार की शर्तों को मानकर उसके आगे आत्मसमर्पण कर यातना से मुक्त हो जाऊं, लेकिन तभी मुझे इमाम हुसैन और कर्बला की याद आई। उनकी याद ने मुझे वह रूहानी ताक़त दी कि मैं उन विपरीत परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता के अधिकार के लिए खड़ा रह सका।
लोग सही कहते हैं कि न्याय के पक्ष में संघर्ष करने वाले लोगों की अंतरात्मा में इमाम हुसैन आज भी ज़िन्दा हैं, मगर यजीद भी अभी कहां मरा है ? यजीद अब एक व्यक्ति का नहीं, एक अन्यायी और बर्बर सोच और मानसिकता का नाम है। दुनिया में जहां कहीं भी आतंक, अन्याय, बर्बरता, अपराध और हिंसा है, यजीद वहां-वहां मौज़ूद है। यही वज़ह है कि हुसैन हर दौर में प्रासंगिक हैं। मुहर्रम का महीना उनके मातम में अपने हाथों अपना ही खून बहाने का नहीं, उनके बलिदान से प्रेरणा लेते हुए मनुष्यता, समानता,अमन,न्याय और अधिकार के लिए उठ खड़े होने का अवसर भी है और चुनौती भी।
कच्चीसराय से निकला चार सौ साल कदीमी दुलदुल का जुलूस
Sarfaraz Ahmad
Varanasi (dil India live). छठवीं मोहर्रम को विश्व प्रसिद्द तकरीबन 40 घंटे तक चलने वाला चार सौ साल कदीमी दुलदुल का जुलूस कच्ची सराय (दालमंडी) इमामबाड़े से उठाया गया। इस जुलूस में कई मशहूर बैंड भी मौजूद थे, जो मातमी धुन बजाते हुए चल रहे थे। जुलूस कच्चीसराय से उठकर विभिन्न रास्तों से होते हुए लल्लापुरा स्थित दरगाह फातमान पहुंचा। इसके बाद वापस चौक होता हुआ मुकीमगंज, प्रह्लादघाट, कोयला बाजार, चौहट्टा होते हुए लाट सरैया के लिए रवाना हुआ। वहां से 8 मोहर्रम की सुबह वापस आकर कच्ची सराय के इमामबाड़े में ही समाप्त होगा। यह जुलूस लगातार 6 से 8 मोहर्रम तक चलता रहता है।
लोगों का कहना है मोहर्रम का यह जुलूस महज़ जुलूस ही नहीं बल्कि उस दौर का इतिहास भी अपने भीतर समेटे हुए है जब इन्हीं जुलूसों में छुपकर आजादी के दीवाने एक मुहल्ले से दूसरे मोहल्ले पहुंच जाते थे और अंग्रेज अपना हाथ मलते रहते थे। आठ थाना क्षेत्रों में यह जुलूस आज भी तकरीबन चालीस घंटा चक्रमण करता है। छठवीं मोहर्रम को विश्व प्रसिद जुलूस में मशहूर बैंड का मातमी दस्ता मातमी धुन बजाते हुए चल रहा था।
जुलूस नयी सड़क, शेख सलीम फाटक, काली महल, पितरकुण्डा, लल्लापुरा होता हुआ दरगाह-ए-फातमान पहुंचा जहां कुछ देर रूकने के बाद पुनः जुलूस चेतगंज, पियरी, कवीरचौरा, नवाब की ज्योढ़ी औसानगंज, दोषीपुरा, दारानगर, सदर इमामबाड़ा, लाट सरैया, पठानी टोला, हनुमान फाटक, चौहट्टा लाल खां, मुकिमगंज, गायघाट, पक्का महाल, चौक और दालमण्डी होते हुए ४२ घंटे तक चल कर वापस कच्चीसराय पहुंचकर समाप्त होगा।
जुलूस में मुख्य रूप से मिर्जा जफर हसन (एडवोकेट), सगीर हसन, हैदर मौलाई, साजिद हुसैन, इमरान जैदी, सैयद आफाक हैदर, रेहान हसन, जरगम हैदर, शारिक हुसैन, कैफी आजमी, हैदर अब्बास चांद, सैयद सकलैन हैदर, शकील अहमद जादूगर आदि शामिल थे।
शेख सलीम फाटक में बाल का मातम आज
सातवीं मोहर्रम पर गुरुवार को बारह बजे दिन में शेख सलीम फाटक स्थित रिजवी हाउस पर महिलाएं बाल का मातम करेगी। मजलिस का आगाज मोहतरमा नुजहत फरमान मजलिस को खिताब करेगीं। इस दौरान नौहाख्वानी मातम अंजुमन हैदरी निस्वां करेगी।
दूल्हा कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक आज
दूल्हा कमेटी के सदर परवेज कादिर खां ने कहा है कि दूल्हा कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक जुमेरात की शाम शिवाला में होगी। बैठक में सभी इलाकों के मेम्बर्स और वरिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी हिस्सा लेंगे। सभी मेम्बर्स को समय से बैठक में आने को कहा गया है।
बड़ी व छोटी मेहंदी का जुलूस
चौहट्टा लाल खां इलाके से मोहर्रम के सातवें रोज़ छोटी मेहंदी व बड़ी मेहंदी के दो कदीमी जुलूस निकाला जाता है। इसमें बड़ी मेहंदी का जुलूस सदर इमामबाड़ा जाकर देर रात सम्पन्न होता है। ऐसे ही अलम व तुर्बत का जुलूस ख्वाजा नब्बू साहब के चहमामा स्थित इमामबाडा से कार्यक्रम संयोजक सयेद मुनाजिर हुसैन मंजू के संयोजन में आठवीं मोहर्रम को रात 8:30 बजे उठेगा। जुलूस उठने पर शराफत अली खां साहब, लियाकत अली साहब व साथी सवारी पढेंगे। जुलूस दालमंडी पहुचने पर अंजुमन हैदरी चौक नौहा ख्वानी व मातम शुरू करेगी। जुलूस अपने कदीमी रास्तों से होकर फातमान पहुंचेगा और पुनः वापस अपने कदीमी रास्तों से होते हुए चहमामा स्थित इमामबाडे मे आकर एक्तेदाम पदीर होगा। जुलूस में पूरे रास्ते उस्ताद फतेह अली खां व साथी शहनाई पर मातमी धुन पेश करेंगे। उधर वरुणापार के अर्दली बाजार में सैय्यद जियारत हुसैन के तारगली स्थित इमामबारगाह से 8 वीं मोहर्रम को दुलदुल, अंलम, ताबूत का जुलूस 4 जुलाई शुक्रवार रात्रि 10 बजे उठेगा। जुलूस अपने कदीमी (पुराने) रास्ते से होकर उल्फत बीबी हाता स्थित स्व.मास्टर जहीर साहब के इमामबाड़े पर समाप्त होगा। जुलूस में अंजुमन इमामिया नौहा व मातम करेंगी। यह जानकारी इरशाद हुसैन "शद्दू" ने दी है।
Varanasi (dil India live). पांचवीं मोहर्रम बनारस के इतिहास में अपना अलग स्थान रखता है। पांच मोहर्रम को ही भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जिस जुलूस में चांदी वाली शहनाई से आंसुओं का नज़राना पेश किया करते थे। वो जुलूस वक़्फ मस्जिद व इमामबाड़ा मौलाना मीर इमाम अली व मेहंदी बेगम गोविंदपुरा छत्तातले से देर रात निकाला गया। जुलूस में पूरे रास्ते उस्ताद फतेह अली खां व उनके साथियों ने शहनाई पर आंसुओं का नज़राना पेश किया तो दरगाहे फातमान में उस्ताद आफाक हैदर ने शहनाई पर मातमी धुन बजाया, मारा गया है तीर से बच्चा रवाब का...। इसे सुनकर तमाम लोगों की आंखें नम हो गई। यहां संचालन शकील अहमद जादूगर कर रहे थे।
जब नहर पर आदा ने अलमदार को मारा...
पांचवी मोहर्रम का जुलूस अपनी पुरानी परंपराओं के अनुसार मुतवल्ली सैयद मुनाज़िर हुसैन 'मंजू' के ज़ेरे एहतमाम उठा। जुलूस उठने से पूर्व मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना ने कर्बला के शहीदों के शहादत पर रौशनी डाली। जुलूस उठने पर नजाकत अली खां व उनके साथियों ने सवारी शुरू की- जब नहर पर आदा ने अलमदार को मारा...। जुलूस गोविंदपूरा, राजा दरवाजा, नारियल बाजार, चौक होते हुए दालमंडी स्थित हकीम जाफर के अज़ाख़ाने पर पहुँचा जहां से अंजुमन हैदरी चौक बनारस ने नौहाख्वानी व मातम शुरू किया। इस दौरान दर्द भरे नौहे, जमाना देख ले क्या क्या मेरे हुसैन से है...जिसमें वफा बुतुराबी, शराफत हुसैन, लियाकत अली खां, साहब ज़ैदी, शफाअत हुसैन शोफी ने नौहाख्वानी की l इस पर तमाम लोगों ने जोरदार मातम पेश किया।
जुलूस दालमंडी, खजुर वाली मस्जिद, नई सड़क, फाटक शेख सलीम, काली महल, पितरकुंड, मुस्लिम स्कूल होते हुए लल्लापुरा स्थित दरगाहे फ़ातमान पहुंच कर देर रात पहुंचा। फ़ातमान से जुलूस पुनः वापस मुस्लिम स्कुल, लाहंगपूरा , रांगे की ताज़िया, औरंगाबाद, नई सड़क कपड़ा मंडी, दालमंडी नया चौक होते हुए इमामबाड़े में समाप्त हुआ l
महाराज बनारस की मन्नत का निकला जुलूस
शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि रामनगर में दुलदुल का कदीमी जुलूस जो महाराज बनारस की मन्नत का है और गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश करता है। इस जुलूस को अहले सुन्नत ने उठाया और लोगों ने इसकी जियारत की। वहीं अर्दली बाजार में हाजी अबुल हसन के इमामबाड़े से कर्बला के 6 महीने के शहीद अली असगर का झूला उठाया गया। अंजुमन इमामिया ने नोहा ख्वानी व मातम किया। यह जुलूस मास्टर जहीर हसन के इमामबाड़े पर समाप्त हुआ। बड़ा गांव बगिया में भी कदीमी जुलूस निकाला गया और कई अंजुमन ने नोहा मातम किया। इस अवसर पर फरमान हैदर ने बताया कि 5 मोहर्रम को बीबी जैनब के दो बेटे औन और मोहम्मद जो इमाम हुसैन के भांजे थे उनकी शहादत का तस्कीरा हर मजलिस में किया गया।
आज निकलेगा छठवीं मोहर्रम
विश्व प्रसिद्ध दुलदुल का जुलूस ६ मोहर्रम २ जुलाई को इमामबाड़ा शीताब राय कच्ची सराय से उठाया जाएगा । अंजुमन जव्वादिया के जेरे इंतजाम 40 घंटे तक शहर में भ्रमण करेगा और 8 वीं मोहर्रम कि सुबह समाप्त किया जाएगा।
Varanasi (dil india live). तीसरी मोहर्रम को अलम व दुलदुल का कदीमी जुलूस अकीदत के साथ औसानगंज में नवाब की ड्योढ़ी से उठाया गया। जुलूस में, नाना मेरे रसूले ख़ुदा मैं हुसैन हूं, गूंजी है कर्बला में सदा मैं हुसैन हूं...। जैसे दर्द भरे नौहे फिजा में बुलंद करते हुए मातमी दस्ता आगे बढ़ा। जुलूस विभिन्न रास्तों से होकर चौक होते हुए दालमंडी देर रात पहुंचा।जुलूस में अंजुमन जव्वादिया नौहाखवानी वह मातम करते हुए चल रही थी। जुलूस नयी सड़क, फाटक शेख सलीम, काली महाल, पितरकुंडा होते हुए दरगाहे फातमान पहुंचेगा।
कुम्हार के इमामबाड़े पहुंचा जुलूस
शिवाला स्थित सैयद आलीम हुसैन रिजवी के इमामबाड़े से एक अन्य जुलूस उठाया गया। यह जुलूस कर्बला के शहीदों और असीरो को खिराजे अकीदत पेश करते हुए अग्रवाल रेडियो, अवधगरवी आदि रास्तों से होते हुए हरिश्चंद्र घाट पहुंचा।
जुलूस हरिश्चन्द्र घाट स्थित कुम्हार के इमामबाड़े पर जाकर समाप्त हो गया। रास्ते भर विभिन्न अंजुमनों ने नौहाखवानी वह मातम का नजराना पेश किया। तीन मोहर्रम को ही रामनगर में बारीगढ़ी स्थित सगीर के इमामबाड़े से भी अलम का जुलूस उठाया गया।
मस्जिदों में हुआ कर्बला का जिक्र
शहर भर की मस्जिदों में इशा की नमाज के बाद कर्बला के शहीद-ए-आजम इमाम हुसैन और इमाम हसन समेत अहले बैत का जिक्र तीसरी मोहर्रम को भी जारी रहा। इस दौरान पठानी टोला, कोयला बाजार, बड़ी बाजार, लल्लापुरा, दालमंडी, रेवड़ी तालाब, मदनपुरा, गौरीगंज, बजरडीहा, अर्दली बाज़ार आदि इलाकों में जिक्रे शहीदाने कर्बला का दौर चला। आयोजन में उलेमा ने कहा कि इमाम हुसैन ने अपनी और अपने कुनबे की शहादत देकर इस्लाम को बचा लिया। आज यजीद का नामलेवा कोई नहीं है मगर इमाम हुसैन रहती दुनिया तक याद किए जाएंगे।
चार मोहर्रम को उठेगा ताजिया
चार मोहर्रम को ताजिये का जुलूस शिवाला में सैयद आलीम हुसैन रिजवी के इमामबाड़े से निकलेगा। जुलूस गौरीगंज स्थित वरिष्ठ पत्रकार काजिम रिजवी के इमामबाड़े पर जाकर समाप्त होगा। चार मोहर्रम को ही चौहट्टा लाल खां में इम्तेयाज हुसैन के मकान से 2 बजे दिन में जुलूस उठकर इमामबाड़ा तक जायेगा। चौथी मुहर्रम को ही तीसरा जुलूस अलम व दुलदुल का चौहट्टा लाल खां इमामबाड़े से रात 8 बजे उठकर अपने कदीमी रास्तों से होता हुआ सदर इमामबाड़ा पहुंच कर समाप्त होगा।
पहली मोहर्रम पर सदर इमामबाड़े में लब्बैक या हुसैन..की गूंजी सदाएं
सरफराज अहमद
Varanasi (dil India live). Mahe Muharram की पहली तारीख एक मोहर्रम 1447 हिजरी शुक्रवार को गम ए हुसैन के सिलसिले का पहला जुलूस अलम और दुलदुल का सदर इमामबाड़े में बरसात के बीच निकाला गया। जुलूस के संयोजक हाजी फरमान हैदर ने बताया कि जुलूस में शहर भर से बच्चे, जवान, बुजुर्ग, जियारत, नौहाख्वानी व मातम के लिए ऊबड़ खाबड़ रास्तों को तय करते हुए , बारिश की परवाह न करते हुए सदर इमामबाड़े पहुंचे। सज्जाद अली गुज्जन मुतवल्ली, तथा शामिल रिज़वी के ज़ेरे निगरानी जुलूस आगे बढ़ा। राहिब अली तबलीगी ने मजलिस को खिताब किया।
इस अवसर पर कई अंजुमनों ने सामूहिक रूप से नोहख्वानी और मातम किया। इसमें अंजुमन सज्जादिया, अंजुमन आबिदीया, अंजुमन हुसैनिया, अंजुमन नसीरूल मोमिनीन, अंजुमन हाशिमिया, अंजुमन सदाये अब्बास ने नौहाख्वानी और मातम किया।ज्जाद अली और अतश बनारसी ने कलाम भी पेश किए। इस अवसर पर जाफर इमाम, फैजी नकवी, अलमदार हुसैन , शब्बीर हुसैन, के अलावा दोषीपुरा, पठानी टोला, कच्ची बाग आदि क्षेत्र के मोमिनीन, रिजवान अलमदार, वगैरा शामिल रहे। फरमान हैदर ने सोझख्वानी की । इस अवसर पर ईरान के समर्थन में तथा अमरीका और इजराइल के विरोध में नारे भी बुलंद हुए। लब्बैक या हुसैन की सदाओं से फिजा गूंजती रही। इस अवसर पे श्री हैदर ने बताया कि २ मोहर्रम को शिवपुर में अंजुमन पंजीतानी के जेरे इंतजाम दुलदुल और अलम का कदीमी जुलूस उठाया जाएगा जिसमें बनारस के अलावा दूसरे शहर की अंजुमने भी हिस्सा लेंगी।
Varanasi (dil India live). 29 जिलहिज्जा को चांद का दीदार हो गया। चांद देखे जाने के साथ ही इस्लामी नये साल माहे मोहर्रम का आगाज़ हो गया। चांद देखे जाने की पुष्टि ‘काजी-ए-शहर’ समेत तमाम चांद कमेटी के ऐलान से हुई। अपने ऐलान में कहा गया कि आज (27 जून) को मोहर्रम का चांद दिखाई दिया है। इसलिए मुहर्रम की 01 तारीख 28 जून को होगी और यौमे आशूरा 6 जुलाई 2025 को मनाया जाएगा। उधर चांद के दीदार संग शिया अजाखाने सजा दिए गए। मजलिसे इस्तेकबालिया बनारस, जौनपुर, लखनऊ, मऊ, आजमगढ, बलिया, गोरखपुर व गाजीपुर आदि शहरों में शुरू हो गई।
दरअसल मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक साल का पहला महीना है। इसी महीने के साथ इस्लामिक नए साल की शुरुआत होती है। वैसे तो ये एक महीना है लेकिन इस महीने में मुसलमान खास तौर पर शिया मुसलमान पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन समेत कर्बला में शहीद हुए 72 वीरों की शहादत का गम मनाते हैं। सन 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के कर्बला में पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन को उनके 72 साथियों के साथ यजीदी सेना ने शहीद कर दिया था। मुहर्रम में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का शिया मुस्लिम गम मनाते हैं। मातम करते हैं।
इस दौरान सुन्नी मस्जिदों में एक से दस मुहर्रम तक सुन्नी मुसलमान शहादतनामा पढते हैं’ तकरीर होती है तो शिया मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत का जिक्र करते हैं। उनका गम मनाने के लिए मजलिसें करते हैं। मजलिसों में इमाम हुसैन की शहादत बयान की जाती है। मजलिस में तकरीर (स्पीच) करने के लिए ईरान से भी इंडिया में आलिम (धर्मगुरू) आते हैं और जिस इंसानियत के पैगाम के लिए इमाम हुसैन ने शहादत दी थी उसके बारे में लोगों को विस्तार से बताया जाता है। उधर लोगों ने एक दूसरे को इस्लामिक नये साल की मुबारकबाद दी। सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक और व्हाट्स एप पर इस्लामी हिजरी नये साल की मुबारकबाद लोग अपने अजीजों से शेयर कर रहे थे।
शहर भर में हुई इस्तकबाले की मजलिसे
आज मोहर्रम के चांद की तस्दीक होते ही हर तरफ फिजा गमगीन हो गई। या हुसैन या हुसैन...की सदाएं फिजा में गूंजने लगी। हर तरफ इस्तकबाले अज़ा की मजलिसे हुईं व इमामबाड़ों में शमा रोशन किया गया और शरबत पर कर्बला के शहीदों की नजर हुई। शहर भर की 28 अंजुमनों ने नोहा और मातम का आगाज़ किया।
शिया जमा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने तकरीर करते हुए कहा कि यह वह महीना है कि जिसमें इमाम हुसैन ने अपने 71 साथियों के साथ इंसानियत को बचाने के लिए कुर्बानी पेश की। बताया कि लाखों की तादाद में मुसलमान और गैर मुसलमान हजरात भी इमाम हुसैन का गम मानते हैं, शहर भर में पहली मोहर्रम से लेकर 13वीं मोहरम तक लगातार जुलूस उठते हैं और सैकड़ो की तादाद में मजलिसे होती हैं। जिसमें खवातीन भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। इस सिलसिले से पहला जुलूस कल शाम ठीक 4:00 बजे उठाया जाएगा जो कैंपस में नोहाख्वानी और मातम के साथ समाप्त होगा। हैदर ने बताया की बनारस शहर में कई जगह रास्तों की परेशानियां हैं और प्रशासन से अपील की जाती है कि वह रास्तों की दुश्वारियां को दूर कराएं और सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं।
इंसानियत के लिए मिसाल है शहादत-ए-हुसैन
इस्लाम की तारीख में मुहर्रम बड़े ही अकीदत, एहतेराम के साथ मनाया जाता है। इंसानियत के लिए शहादत-ए-हुसैन एक मिसाल है। मुहर्रम का चांद दिखाई देने के बाद मर्सियाखान सैयद नबील हैदर ने इस्तेक़बाले अजा की मजलिस को खिताब करते हुए कहा कि मुहर्रम पर 2 महीना 8 दिन ग़म मनाया जाता है। यही नहीं पूरे दो माह 8 दिन शिया समुदाय के लोग किसी भी खुशी में शरीक नहीं होते। चांद दिखाई देने से आज ही से इमाम बारगाह, अजाखानो, घरों में मजलिसों का सिलसिला शुरू हो गया।
नबील ने कहा कि इमाम हुसैन ने जो इन्सानियत की राह दिखाई है ,वही हक पर चलने की नेक राह है। इमाम हुसैन ने जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का पैगाम दिया, हुसैन ने जालिम खलीफा का साथ नहीं दिया । इसीलिए आपको अपने 72 साथियों के साथ इतनी बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी, लेकिन यही कुर्बानी दीन को बचा ले गई, और उसी कुर्बानी की वजह से इंसानियत दुनिया में अभी भी जिंदा है। इमाम हुसैन का बलिदान सत्य, न्याय, धार्मिकता महान प्रेरणा है। उनका बलिदान अन्याय के खिलाफ लड़ने और सच्चाई के मार्ग पर चलने के लिए एक शक्तिशाली संदेश है।