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बुधवार, 23 जुलाई 2025

National: mumbai Main 2006 को हुए सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में सभी को हाईकोर्ट ने माना निर्दोष

सीरियल ट्रेन ब्लास्ट में सभी 12 आरोपी को किया गया बाइज्जत बरी

19 साल बाद अपनों के बीच पहुंचे तो छलका आंसु, परिवार संग खाया खाना


Mumbai (dil India live)। मुंबई में 2006 के सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में हाईकोर्ट ने सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है। करीब 19 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह फैसला आया है। बरी हुए लोगों में मोहम्मद अली शेख ने मीडिया को बताया कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया और प्रताड़ित किया गया। परिवार के बीच सालों बाद सकून से बैठे हुुए अली शेख ने कहा कि 'अधिकारियों ने मुझे बंदूक की नोक पर धमकाया और सरकारी गवाह बनने के लिए 10 लाख रुपये और दुबई में नौकरी के साथ 10 हजार रुपये महीने खर्च की हर महीने देने की पेशकश की थी। इन सब के बाद भी हमने गुनाह कबूल नहीं किया, क्योंकि हम निर्दोष थे।'

मोहम्मद अली शेख ने बताया कि 'हाईकोर्ट ने हमें आजाद कर दिया है। सत्य की ही जीत हुई है। जरूरत पड़ने पर हम अपना केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे और हमारी जीत वहां भी पक्की है। मामले की ऑनलाइन ही सुनवाई चल रही थी। उसी दौरान अपने बरी होने की जानकारी मिली थी।

ये सुनकर 19 साल बाद अपने परिवार से मिलने की आस जगी थी। एहतेशाम सिद्दीकी और मुझे सोमवार शाम नागपुर जेल से रिहा कर दिया गया था। उसके बाद हम मंगलवार सुबह 3.30 बजे मुंबई के लिए रवाना हुए।' इस दौरान 19 साल बाद अपने परिवार से मिलने पर आंखों से आंसु छलक पड़े। इस जीत पर उन्होंने खुशी जाहिर की और आगे की कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कही। बता दें कि कोर्ट ने कहा कि प्रॉसीक्यूशन यानी सरकारी वकील आरोपियों के खिलाफ केस साबित करने में नाकाम रहे हैं।

बता दें कि मुंबई में हुए हमलों की जांच कर रही एटीएस की ओर से कोर्ट में दावा किया गया था कि शेख के घर पर पाकिस्तानी व्यक्ति आया था। उसी ने ही 11 जुलाई 2006 को ट्रेनों में  बम रखे थे मगर कोर्ट में यह सिद्ध नहीं हो पाया।

उधर कोर्ट के फैसले के बाद आरोपों से बरी होने वाले मोहम्मद अली शेख के गोवंडी में मौजूद घर पर उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने मिठाइयां खिलाकर बधाई दी। इस दौरान मोहम्मद ने कहा कि वे 19 साल बाद अपने परिवार के साथ बैठकर खाना खा रहे हैं।

56 साल के मोहम्मद अली शेख ने अपने घर की दहलीज पर बैठे हुए मीडिया से कहा, 'अपने परिवार से दोबारा मिलने की खुशी बयान नहीं की जा सकती है। मैं 19 साल बाद, अपनी पत्नी, बच्चों, भाइयों और बहनों के साथ बैठा और खाना खा पाया हूं। हमें झूठे मामलों में फंसाया गया था। इस दौरान हमें खूब टॉर्चर किया गया और इंसल्ट करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इस पूरे मामले के दौरान मेरे 11 साल के बेटे को भी एटीएस अधिकारी ने थप्पड़ मारा था। अधिकारी मेरे घर आते और पूरे परिवार को परेशान करते थे।

ठाणे जेल में बंदी के दौरान अपने भाई मुनव्वर के निधन के बाद पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसे कैंसिल कर दिया गया। बाद में पिता की भी मृत्यु हो गई। उस बार, पैरोल मंजूर कर ली, लेकिन ठाणे जेल से गोवंडी तक पुलिस एस्कॉर्ट का शुल्क 1.7 लाख रुपये था। मैं इसका खर्च कैसे उठा सकता था?

जेल में भी करता था पढाई

मैं जेल में रहते हुए भी पढ़ाई कर रहा था। जेल में रहते हुए मैंने टूरिज्म में दो कोर्स पास किए। आर्ट में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और एमए (हिस्ट्री) के फर्स्ट ईयर की परीक्षा दी। अब अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने की योजना है।'