यज्ञ का महत्व न केवल लौकिक बल्कि आध्यात्मिक
Varanasi (dil india live). सनातन हिंदू धर्म (Hindu Religion) का परम और सर्वोच्च शास्त्र – पवित्र वेद – परमात्मा को ‘अनंत चैतन्यमय’ के रूप में वर्णित करता है। ऋषि-मुनि ध्यान के माध्यम से इस अनंत चैतन्यमय परमात्मा की शरणागति की प्रार्थना किया करते थे। वे मन के तीनों स्तर – चेतन, अवचेतन एवं अचेतन – के माध्यम से ध्यान करते हुए उस दिव्य महाचैतन्य से गहनतम संबंध स्थापित करते थे। कालांतर में यज्ञ के माध्यम से इस चैतन्यमय भगवान की शरण, स्तुति और प्रार्थना की जाती रही। यज्ञ का महत्व न केवल लौकिक बल्कि आध्यात्मिक भी रहा है। समय के साथ इन वैदिक यज्ञों ने जो रूप लिया, वही आज की पूजा-पद्धति है।
पूजा में मूर्तियों के माध्यम से, शास्त्रसम्मत विवरणों के अनुसार भगवान के रूप या प्रतीक की स्थापना की जाती है, ताकि साधक ध्यान और भक्ति से भगवान के चैतन्य से जुड़ सकें। कारण यह है कि यदि इस अनंत चैतन्य की कोई प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति न हो, तो वह सामान्य जनमानस को शून्य या अमूर्त प्रतीत होगा।
यह स्मरणीय है कि किसी भी भक्त ने कभी पत्थर या मिट्टी की प्रतिमा से कुछ नहीं माँगा; वह तो उस प्रतिमा में प्रतिष्ठित अनंत चैतन्य से संवाद करता है। भक्ति की भावधारा से वह उस अनिर्वचनीय परमात्मा के निकट पहुँचने का प्रयास करता है – अतीत में भी, वर्तमान में भी और भविष्य में भी।
यहां एक दृष्टांत प्रासंगिक है। जैसे एक विद्युत बल्ब का कोई प्रयोजन नहीं यदि उसमें विद्युत धारा प्रवाहित न हो। किंतु विद्युत जुड़ते ही बल्ब प्रकाशित हो उठता है, यद्यपि विद्युत स्वयं अदृश्य है। इसी प्रकार मूर्ति में जब वैदिक मंत्रों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, तब वह एक जीवंत प्रतीक बन जाती है – उस अनंत चैतन्यमय प्रभु की उपस्थिति से युक्त। अब कल्पना कीजिए–बिना किसी रूप या प्रतीक के उस अनंत चैतन्यमय परमात्मा का ध्यान करना। आप पाएँगे कि वह आपके मन में शून्यता उत्पन्न कर देगा। अस्तित्वहीन सा प्रतीत होगा।
इसलिए यह कहना अत्यंत समीचीन है कि सभी शास्त्रों के परम शिखर, अपौरुषेय एवं नित्य, स्वयं परमेश्वर के श्वास से प्रकट पवित्र वेदों में वर्णित निराकार परमात्मा की उपासना और मूर्ति के माध्यम से की जाने वाली उपासना में कोई विरोध नहीं है – अपितु यह दोनों परस्पर पूरक हैं।
अंत में एक कथा दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत है। सातवीं कक्षा का एक छात्र बीजगणित का अध्ययन कर रहा था। उसने तीसरी कक्षा के कुछ विद्यार्थियों से पूछा – “बताओ, 3 - 5 कितना होता है?” तीसरी कक्षा के छात्र ठहाका मारकर हँस पड़ा। उनमें से एक ने कहा – “यह तो पागल है! छोटे अंक से बड़े अंक को घटाया जा सकता है क्या! हमारे गुरुजी ने तो यही सिखाया है कि घटाव केवल बड़े अंक से छोटे का होता है।” सातवीं कक्षा का छात्र कहता रहा – “उत्तर है -2”, पर तीसरी कक्षा के बालक और भी ज़ोर से चिल्लाए – “यह तो पागल है!” और सब एक स्वर में बोले – “सही है! सही है!” अब सोचिए – यहां दोष किसका था? न तो सातवीं कक्षा के छात्र का, और न ही तीसरी कक्षा के छात्रों का। समस्या केवल उनकी ‘ज्ञान की सीमा’ में थी। इसी प्रकार हमारे समाज में भी लोग अपने-अपने बौद्धिक स्तर और ज्ञान की सीमा के अनुरूप ही विचार और निर्णय करते हैं। हमारा सनातन धर्म, हमारी शास्त्रीय परंपरा और आध्यात्मिक विचारदृष्टि ‘पोस्ट-डॉक्टोरल’ स्तर की है। इसे सम्यक रूप से समझने के लिए सही मार्ग पर ज्ञान की साधना और प्रभु की असीम कृपा आवश्यक है।
“ॐ स नः पितेव सूनवेऽग्ने सुपायनो भव।
सचस्वा नः स्वस्तये।।”
– ऋग्वेद 1.1.9
हे अग्निदेव! जैसे पिता अपने पुत्र के प्रति सुलभ होता है, वैसे ही आप हमारे प्रति भी सहज सुलभ हों। आप हमें परस्पर कल्याण के लिए एकसूत्र में बाँधें। हमारे जीवन से त्रिविध तापों की शांति हो।
(नोट -लेखक के यह अपने विचार हैं इससे संपादक या संपादकीय टीम का सहमत होना जरूरी नहीं है)



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