शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

मशहूर शायर Ahmad Azmi का काव्य संकलन “क़तरा-ए-शबनम” का विमोचन कल

अहमद आज़मी : बनारस की गंगा-जमुनी आत्मा का कवि


Zamzam Ramnagari

Varanasi (dil india live). Banaras (बनारस) — यह शब्द केवल एक नगर (City) नहीं, भारतीय आत्मा का प्रतीक है। यहाँ की हवा में धर्म नहीं, दर्शन बहता है; यहाँ की गलियों में समय ठहरता नहीं, विचार बनकर गूंजता है। इस नगरी की सुबहें आरती से नहीं, गंगा की सांसों से आरंभ होती हैं। इसी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भाषाई प्रवाह में एक कवि अपनी आवाज़ रखता है — Ahmad Azmi (अहमद आज़मी)।

Ahmad Azmi (अहमद आज़मी) की कविता बनारस की गंगा-जमनी संस्कृति की जीवित मिसाल है। वे उस परंपरा के कवि हैं जहाँ तुलसी की करुणा, कबीर की सच्चाई और नज़ीर की लोकधर्मिता एक साथ मिलती है। उनकी कविता न हिन्दू है न मुसलमान — वह भारतीय है, मानवीय है। उसमें बनारस के घाटों की भक्ति है, साड़ियों की कारीगरी की नजाकत है, और यहाँ के सूफिज्म की वह सादगी है जो ज्ञान को अनुभव बनाती है।

उनके संग्रह “क़तरा-ए-शबनम” को यदि हम ध्यान से पढ़ें तो यह मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि बनारस की आत्मा का आधुनिक रूपांतरण है। उनकी पंक्तियाँ गंगा की लहरों-सी बहती हैं — शांत भी, गहराई लिए हुए भी। जैसे जल में प्रतिबिंबित होती हुई संस्कृति, वैसे ही उनके शब्दों में उतरता हुआ मनुष्य का सामूहिक चेहरा।

अहमद आज़मी की कविताओं में ‘घर’ केवल एक जगह नहीं, एक अनुभव है —जहां मां की दुआ, बच्चे की हंसी और पिता की चुप्पी — सब एक भाव-संगीत में घुल जाते हैं। वे जब लिखते हैं, तो लगता है मानो शब्द नहीं, संस्कार बोल रहे हों। उनकी पंक्तियों में वह संवेदना है जो कबीर के “सांच कहो तो मारन धावै” से लेकर प्रेमचंद के “मानव धर्म” तक की परंपरा को जोड़ती है। मशहूर साहित्यकार नामवर सिंह कहा करते थे "कवि वही है जो भाषा में जीवन को पुनर्जन्म दे।" अहमद आज़मी की कविता इसी पुनर्जन्म की प्रक्रिया है। उनके शब्द केवल माध्यम नहीं, साक्षी हैं —एक ऐसे समाज के साक्षी जो विभाजन की दीवारों से थक चुका है और जो कविता में अपने लिए शरण ढूंढता है। उनकी कविता में हमें नफ़रत की ध्वनि नहीं, संवाद की गूंज सुनाई देती है। उनकी भाषा में आस्था है, लेकिन वह संप्रदाय की नहीं बल्कि उस व्यापक भारतीय चेतना की जो बुद्ध, कबीर और तुलसी से होती हुई गालिब तक पहुंचती है।

बनारस की सांस्कृतिक बुनावट में, जहां साड़ी का ताना-बाना हाथों से बनता है, वहां अहमद आज़मी शब्दों से बुनते हैं इंसानियत का कपड़ा। जिस तरह बुनकर धागों में रंग भरता है, उसी तरह यह कवि भावनाओं में अर्थ भरता है —रंगों का, रिश्तों का, और यादों का अर्थ। उनकी कविताओं में गंगा केवल नदी नहीं, एक जीवित प्रतीक है —जो सबको जोड़ती है, सबको एक करती है। गंगा उनके लिए भक्ति का नहीं, एकता का प्रतीक है; जहां हर आस्था, हर जाति, हर पहचान एक साझा मानवता में घुल जाती है।

“क़तरा-ए-शबनम” का अर्थ ही है 'वह नन्हा-सा बिंदु जो सृष्टि की व्यापकता में भी अपनी मासूमियत बचाए रखे'। अहमद आज़मी के लिए यह कविता का नहीं, मनुष्य होने का रूपक है।उनकी हर पंक्ति इस प्रश्न के साथ आती है —क्या हम अब भी उतने ही मनुष्य हैं जितने होना चाहिए? उनकी काव्य-दृष्टि में बनारस केवल पृष्ठभूमि नहीं, एक जीवित चेतना है —जहां सूफी संतों का दर्शन, कलाकारों की साधना और शब्दों की शुचिता एक साथ बहती है। वह हमें याद दिलाते हैं कि साहित्य का अर्थ केवल सौंदर्य नहीं, सत्य भी है — और जब तक सत्य जीवित है, कविता भी जीवित रहेगी। अहमद आज़मी की कविता हमें यह एहसास कराती है कि शब्दों का असली काम विभाजन नहीं, मिलन है; कविता का उद्देश्य विचार नहीं, संवेदना है; और कवि का धर्म किसी धर्म से बड़ा है मानवता का धर्म। इसलिए जब हम “क़तरा-ए-शबनम” पढ़ते हैं, तो लगता है जैसे हम बनारस की किसी संध्या में बैठे है गंगा के किनारे, आरती की लहरियों के बीच, जहां से कोई कवि कह रहा है —"हमारे बीच जो भी है, वह शब्द नहीं, आत्मा का संवाद है।अहमद आज़मी उस परंपरा के कवि हैं जो कविता को समाज की आत्मा मानते है। वे उन दुर्लभ सर्जकों में हैं जिनकी कविताएं केवल पढ़ी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं।

वे हमें यह याद दिलाते हैं कि भारत केवल भूगोल नहीं, भावना है। और इस भावना की गहराई में गंगा, बनारस और कविता — तीनों एक ही लय में बहते हैं।

“क़तरा-ए-शबनम” का विमोचन कल
 शायर अहमद आज़मी की ग़ज़लों और नज़्मों का बहुप्रतीक्षित संकलन “क़तरा-ए-शबनम” शीघ्र ही पाठकों के सामने आ रहा है। इस काव्य-संग्रह का विमोचन समारोह आगामी 12 अक्टूबर 2025 (रविवार) को सायं 4:00 बजे, काशी पत्रकार संघ, पराड़कर स्मृति भवन, मैदागिन में आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं चिंतक प्रो. गुरुचरण सिंह करेंगे तथा मुख्य अतिथि प्रख्यात कवि और विद्वान प्रो. याकूब यावर होंगे।



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