समर ग़ाज़ीपुरी एक जीवंत शख़्सियत
Sarfaraz Ahmad
Varanasi (dil India live). साहित्य के विस्तृत आकाश में कुछ नक्षत्र ऐसे होते हैं, जिनकी आभा युगों तक बनी रहती है। उनका नाम लिया जाए तो केवल काव्य नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कृति और सौहार्द्र की संपूर्ण छवि सामने आ जाती है। समर ग़ाज़ीपुरी ऐसी ही एक जीवंत शख़्सियत हैं—शायर भी, नाज़िम भी, और उससे बढ़कर एक सच्चे इंसान।
1963 में ग़ाज़ीपुर के ग़नी चक, मुहम्मदाबाद में जन्मे, वह अपने पिता स्वर्गीय मोहम्मद अशरफ़ सिद्दीक़ी की स्मृति को संजोए हुए हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने वाले समर साहब आज वाराणसी के पड़ाव में रहते हैं, लेकिन उनका दिल अपने पैतृक गाँव ग़नी चक और यूसुफ़पुर की मिट्टी से गहराई से जुड़ा है।
समर ग़ाज़ीपुरी की साहित्यिक यात्रा 1980 के दशक की शुरुआत में उस वक़्त शुरू हुई, जब वह ग़ाज़ीपुर में पढ़ाई के लिए रोज़ ट्रेन से सफ़र करते थे। इस सफ़र में उनकी मुलाक़ात रामनाथ राय जैसे शायरी के दीवानों से हुई, जिन्होंने उनके भीतर छुपे कवि को उभारा। गाँव की तुकबंदी की परंपरा ने उनके शब्दों को पहला आकार दिया। बनारस के साहित्यिक माहौल ने उनकी प्रतिभा को पंख दिए। 'अहमद' अज़मी के घर की साहित्यिक गोष्ठियाँ, :मतीन' बह्रामी की प्रेरणा और उर्दू सोसाइटी के आयोजनों ने उन्हें मंच तक पहुँचाया। पीतरकुंडा में उनका पहला बड़ा प्रदर्शन, जहाँ डी.एच. पांडे नज़र कानपुरी और डॉ. अनवर जलालपुरी जैसे साहित्यिक दिग्गज मौजूद थे, उनकी काव्य-प्रतिभा का परिचय बन गया।
"समर" साहब की नाज़िम के रूप में कहानी एक अनपेक्षित मोड़ से शुरू हुई। सलीम शिवालवी के एक मुशायरे में जब नाज़िम नहीं पहुँचे, तो काविश नारी ने मंच पर उनका नाम पुकारा। पहली बार नाज़िम की भूमिका में उतरे समर ने ऐसी जादूगरी दिखाई कि यह सिलसिला देशभर के मुशायरों तक फैल गया। उनकी मखमली आवाज़, शब्दों की नज़ाकत और महफ़िल को बाँध लेने की कला उन्हें एक बेमिसाल नाज़िम बनाती है।
उनके उस्ताद ‘नश्तर बनारसी’ ने शब्दों का जादू सिखाया। ‘तरब’ सिद्दीकी, ‘एहतेशाम’ सिद्दीकी और ‘अहमद’ अज़मी जैसे साहित्यकारों का साथ उनकी भाषा, लय और विचार को परिष्कृत करता गया। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार, प्रेम की ऊष्मा, जीवन की नश्वरता और देशप्रेम की उज्ज्वल आभा साफ झलकती है,
"जो चाहे पढ़ ले ये रख दी है रू-ब-रू सबके
खुली किताब के जैसी है ज़िंदगी मेरी"
"क़लम की नोक को ख़ंजर की धार कर देगा
पढ़ा-लिखा है वो, लफ़्ज़ों से वार कर देगा"
"मैं आंधियों को भी हैरत में डाल आया हूँ
दिया जला के हवा में उछाल आया हूँ"
"चंद ही लोग हैं जो करते हैं नफ़रत पैदा
आम हिन्दू न मुसलमान बुरा होता है"
"हमारा मुल्क भारत तो सभी धर्मों का संगम है
यहाँ पर वेद वाले हैं, यहाँ क़ुरआन वाले हैं"।।
समर ग़ाज़ीपुरी ने अपनी काव्य-यात्रा को दो संग्रहों में समेटा है:
1.रंग-ए-हयात (2015)
2.चाँद और झील (2025)
ये संग्रह उनकी साहित्यिक मेहनत और काव्य के प्रति समर्पण का प्रतीक हैं। समर ग़ाज़ीपुरी के व्यक्तित्व में साहित्य और मित्रता समान रूप से प्रवाहित हैं। मशहूर उस्ताद शायर जनाब आबिद सलेमपुरी साहब के साथ उनकी आत्मीयता उनके स्वभाव की गहराई को दर्शाती है। उनके शब्द और व्यवहार दोनों में अपनापन झलकता है।
“ये ज़खीरा नहीं है लफ़्ज़ों का, फ़िक्र की काइनात है मेरी
ऐसी-वैसी नहीं किताब है, ये दास्तान-ए-हयात है मेरी”
समर ग़ाज़ीपुरी की यह दास्तान साहित्य के नभ में एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह है, जो आने वाले समय में भी अपनी रचनाओं और व्यक्तित्व से महफ़िलों को रोशन करता रहेगा। वह केवल शायर या संचालक नहीं, बल्कि उन विरल हस्तियों में से हैं, जिनके शब्द और कर्म, दोनों, समाज में प्रेम, भाईचारा और सौंदर्य के बीज बोते हैं।
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