नबी इस रात 'रब' से मुलाकात कर नमाज़ का लेकर आए थे तोहफा
1. मक्का से यरूशलेम (मस्जिद-ए-अक्सा)
हजरत जिब्राइल (अ.स.) जन्नत से 'बुराक' (एक सफेद सवारी) लेकर आए। आप (स.अ.व.) उस पर सवार होकर पलक झपकते ही बैतुल मुकद्दस (मस्जिद-ए-अक्सा) पहुंच गए। वहां हजरत आदम (अ.स.) से लेकर हजरत ईसा (अ.स.) तक तमाम नबी मौजूद थे। हुजूर (स.अ.व.) ने उन सबकी नमाज में इमामत फरमाई। इसी वजह से आपको 'इमामुल अंबिया' कहा जाता है।
2. आसमानों का सफर और नबियों से मुलाकात
मस्जिद-ए-अक्सा से आप आसमानों की तरफ तशरीफ ले गए। हर आसमान पर महान नबियों ने आपका इस्तकबाल किया। इस दौरान पहले आसमान पर हजरत आदम (अ.स.) से मुलाकात हुई। दूसरे आसमान पर हजरत ईसा (अ.स.) और हजरत यहया (अ.स.) से मिले। तीसरे आसमान पर हजरत यूसुफ (अ.स.) से तो चौथे आसमान पर हजरत इदरीस (अ.स.) व पांचवें आसमान पर आपकी मुलाकात हजरत हारून (अ.स.) से हुई। ऐसे ही छठवें और सातवें आसमान पर हजरत मूसा (अ.स.) व हजरत इब्राहिम (अ.स.), जो 'बैतुल मामूर' (फरिश्तों का काबा) से टेक लगाए हुए थे प्यारे नबी से मुलाकात हुई।
इसके बाद आप 'सिदरतुल मुन्तहा' पहुँचे (एक बेरी का दरख्त जो कायनात की सरहद है)। यहाँ हजरत जिब्राइल (अ.स.) रुक गए और कहा कि अगर मैं यहां से एक उंगली के पोर बराबर भी आगे बढ़ा तो नूर की वजह से जल जाऊंगा। इसके बाद हुजूर (स.अ.व.) तन्हा अल्लाह रब्बुल इज्ज़त के करीब पहुंचे, जहां न कोई फरिश्ता था न कोई परदा। वहीं नमाज का तोहफा मिला।
जन्नत और दोजख के मंजर
सफर के दौरान आपको अल्लाह की कुदरत की बड़ी निशानियां दिखाई गईं। आपने जन्नत देखी। आपने जन्नत की नेमतें और वहां मिलने वाले महलात देखे। इस दौरान दोजख (जहन्नुम) भी देखा। आपने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा जिन्हें उनके बुरे कामों की सजा मिल रही थी।
चुगलखोर: जो अपनी जुबान से दूसरों की बुराई करते थे, वे अपने नाखूनों से अपने चेहरों को नोच रहे थे।
ब्याज (सूद) लेने वाले: जिनका पेट कमरों की तरह बड़ा था और उनमें सांप दौड़ रहे थे।
यतीमों का माल खाने वाले: जिनके मुंह में आग के अंगारे डाले जा रहे थे।
वापसी और सुबह का मंजर
जब आप वापस आए, तो अभी आपका बिस्तर गर्म था और वजू का पानी बह रहा था (यानी अल्लाह ने वक्त को थाम दिया था)। मेराज के सफर से वापसी के बाद, जब अगली सुबह हुजूर (स.अ.व.) ने खाना-ए-काबा के पास बैठकर कुरैश के लोगों को इस हैरतअंगेज सफर के बारे में बताया, तो मक्का के अधर्मियों ने इसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। उनके लिए यह नामुमकिन था कि कोई शख्स एक ही रात में मक्का से यरूसलेम जाए, वहां से सातों आसमानों की सैर करे और वापस भी आ जाए।
अबू जहल और अन्य अधर्मियों ने सोचा कि आज अच्छा मौका है, अबूबक्र को बहकाया जाए। वे दौड़ते हुए हजरत अबूबक्र (र.अ.) के पास पहुंचे और उनसे पूछा: "ऐ अबूबक्र! क्या तुम अपने साथी (मोहम्मद स.अ.व.) की इस बात पर यकीन करोगे कि वह आज रात बैतुल मुकद्दस होकर आए हैं और आसमानों की सैर की है?" हजरत अबूबक्र (र.अ.) ने बिना किसी सोच-विचार के एक ऐसा सवाल पूछा जिसने अधर्मियों को लाजवाब कर दिया।
> "क्या यह बात मोहम्मद (स.अ.व.) ने खुद कही है?" अधर्मियों ने कहा: "हां, वह अभी काबा में यही कह रहे हैं।" तब हजरत अबूबक्र (र.अ.) ने बड़े यकीन के साथ फरमाया:
> "अगर उन्होंने यह कहा है, तो यकीनन यह सच है। मैं तो इससे भी बड़ी बातों पर यकीन करता हूँ कि उनके पास आसमानों से अल्लाह की तरफ से 'वही' (संदेश) आती है।" हजरत अबू बक्र का यह जवाब सुनकर अधर्मियों दंग रह गए। उनके इसी बेमिसाल यकीन की वजह से नबी (स.अ.व.) ने उन्हें 'सिद्दीक' का खिताब दिया।
बैतुल मुकद्दस की निशानियां
अधर्मियों ने हुजूर (स.अ.व.) को आजमाने के लिए एक और शर्त रखी। उन्होंने कहा, "अगर आप वहां गए थे, तो हमें बैतुल मुकद्दस (मस्जिद-ए-अक्सा) की निशानियां बताएं (कितने दरवाजे हैं, कैसी बनावट है?)"हुजूर (स.अ.व.) वहां इबादत के लिए गए थे, न कि इमारत को गिनने। लेकिन अल्लाह ताला ने अपनी कुदरत से मस्जिद-ए-अक्सा को हुजूर (स.अ.व.) की नजरों के सामने ला दिया। आप उसे देखते जा रहे थे और काफिरों के हर सवाल का जवाब देते जा रहे थे। यह देखकर अधर्मी हैरान रह गए क्योंकि आपकी बताई एक-एक बात सही थी।




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