शनिवार, 22 अगस्त 2026

Cultural News Varanasi Uttar Pradesh 21 August 2026: Bharat Ratna Ustad Bismillah Khan की 20 वीं बरसी पर दरगाहे फातमान में गूंजी शहनाई

दुआख्‍वानी में चाहने वालों ने अकीदत से हाथ उठाकर मांगी मगफिरत की दुआएं
Cultural News Varanasi Uttar Pradesh, 21 August 2026 को Bharat Ratna
दरगाहे फातमान में दुआ ख्वानी में जुटे लोग 


dil india live (Varanasi). शाहनाई के शहंशाह, भारत रत्‍न उत्‍साद बिस्मिल्लाह खान (Bharat Ratna Ustad Bismillah Khan) की 20 वीं बरसी (पुण्यतिथि) दरगाहे फातमान स्थित उस्ताद की कब्र पर अकीदत और एहतराम के साथ मनाई गई। इस मौके पर किसी ने फूल चढ़ाए तो परिजनों ने पाक कुरान की तेलावत की। यहां हुई दुआख्‍वानी में उनके चाहने वालों ने अकीदत से हाथ उठाकर मगफिरत की दुआएं मांगी। कौन थे भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान क्या हुआ आयोजन दिल इंडिया लाइव पर पढ़िए पूरी खबर, देखिए वीडियो और तस्वीरें...

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करते उस्ताद बिस्मिल्लाह खान व अन्य फाइल फोटो 

गौरतलब हो कि 21 अगस्त 2006 में भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का इंतकाल हुआ तो ऐसा लगा बनारस पर कोई बड़ी आफ़त आ गई हो। उस्ताद के सेक्रेटरी रहे एस जावेद कहते हैं कि देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजे जाने के बाद भी उस्ताद को सादगी पसंद थी पूरी दुनिया घूमी पर कभी किसी बात का उन्होंने घमंड नहीं किया। बनारस की गलियों में रिक्शे पर बैठकर घूमना और बनारसी पान का लुत्फ लेना उनकी जिंदगी का हिस्सा था। जब मोहर्रम में शहनाई से आंसुओं का नज़राना पेश करते तो जिसे शहनाई और धुन की कोई समझ भी नहीं है वो भी रो पड़ता था।

21 अगस्त 2006 को शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की सासें भले ही थम गई, लेकिन उनकी शहनाई की गूंज और बनारसी मिजाज के उनके किस्से रहती दुनिया तक याद किए जाएंगे। भारत रत्न एन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के पुत्र आफाक हैदर, रिजवान हैदर ने शहनाई बजाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। वहीं बिलाल अली ने दुक्कड़ बजाकर दादा की परंपरा को निभाया।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा शुक्रवार को दरगाह फातमान में सुबह 11 बजे से दुआ ख्वानी (प्रार्थना सभा) और श्रद्धांजलि कार्यक्रम की शुरुआत हुई तो उस्ताद की कब्र और मकबरे पर दुआख्वानी, कुरानख्वानी के साथ गुलपोशी कर काशीवासियों ने उन्हें याद किया। उनके पौत्र आफाक हैदर ने शहनाई की तान से दादा की याद ताजा की। उस्ताद की चौथी पीढ़ी में उनके प्रपौत्र मोहम्मद अली ने भी शहनाई बजाकर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को खिराजे अकीदत पेश किया।


21 को पैदा और 21को ही हुए जुदा 

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान 21 मार्च को पैदा और 21 अगस्त को ही हम सबसे जुदा हुए। 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में जन्मे बिस्मिल्लाह खां का असली नाम कमरुद्दीन था। बचपन में जब उनके दादा रसूल बख्श खां ने उन्हें पहली बार देखा तो उनके मुंह से सहसा निकल पड़ा था बिस्मिल्लाह। यहीं नाम आगे चलकर शहनाई का पर्यायवाची बन गया। जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का कहीं जिक्र होता है तो शहनाई की तस्वीर सभी के ज़ेहन में उतर आती है शहनाई का नाम लेने पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का चेहरा सामने आ जाता है। 

15 अगस्त 1947 को जब भारत ने आजादी की पहली भोर देखी तब लाल किले की प्राचीर से आज़ाद भारत का स्वागत उस्ताद की शहनाई की गूंज से हुआ था। उन्होंने राग काफी बजाकर देश की आजादी का खैरमकदम किया था।

नन्ही उम्र में आ गए गंगा किनारे

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान नन्ही सी उम्र में गंगा किनारे बसे बनारस आ गये और यहां से पूरी दुनिया में छा गये। उनके परिवार के नजदीकी शकील अहमद जादूगर बताते हैं कि छह वर्ष की उम्र में वे बनारस आ गए और अपने मामा अली बख्श 'विलायत (अल्लन बिलातू) के साथ शहनाई सीखने लगे। उनके मामू जान विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थे और यहीं से नन्हें बिस्मिल्लाह के भीतर संगीत और साधना का अनूठा मेल अंकुरित होता दिखा। उनकी शहनाई से निकलने वाला हर सुर लोगों के दिलों को छूने लगा और देखते ही देखते उनका नाम दुनिया के कोने-कोने पर जा पहुंचा।

अंत तक नहीं छोड़ी गंगा और काशी 

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का काशी से अटूट रिश्ता रहा। उस्ताद जब हयात में थे तो कहते थे कि दुनिया में कहीं भी चले जाएं, लेकिन उन्हें जो सुकून गंगा किनारे बालाजी घाट और काशी विश्वनाथ के द्वार पर मिलता है वो कहीं और नहीं मिलता। अमेरिका ने जब वहां की नागरिकता देने और अमेरिका में बसने का प्रस्ताव दिया तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने सवाल किया था कि क्या अमेरिका में गंगा व बालाजी मंदिर है और उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। 


कोई टिप्पणी नहीं: