“गुल टूट रहे हैं न चमन टूट रहा है
फिर भी मेरे सय्याद का मन टूट रहा है।”
साहित्यिक महफिल में राष्ट्रीय एकता, भाईचारे और स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई श्रद्धांजलि
dil india live (Varanasi). वाराणसी में स्वतंत्रता दिवस की स्मृति और उसके पीछे छिपे संघर्ष तथा बलिदान को याद करते हुए सामाजसेवी हाजी इश्तियाक अहमद अंसारी के औरंगाबाद स्थित दौलतखाने पर एक भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया। यह साहित्यिक संध्या वरिष्ठ शायर, पत्रकार और राष्ट्रीय-सामाजिक चेतना के सजग प्रतिनिधि मरहूम ताजुद्दीन अशअर रामनगरी की याद में किया गया था। कार्यक्रम की अध्यक्षता सामाजिक व सियासी हस्ती अतहर जमाल लारी ने की, जबकि संचालन चर्चित कवि जमजम रामनगरी ने अपनी शालीनता, सहज विनोद-बोध और प्रभावशाली वक्तृत्व के साथ निभाई।
शुरुआत प्रसिद्ध अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल्ला बिन गफ्फार के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज जिस आजादी को हम सहज रूप से अपना अधिकार मानते हैं, उसके पीछे असंख्य ज्ञात-अज्ञात लोगों के संघर्ष, त्याग और बलिदान की लंबी कहानी है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में उलेमा तथा मुस्लिम महिलाओं की भूमिका का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने साहस, संकल्प और त्याग से आजादी की लड़ाई को मजबूती प्रदान की।
उन्होंने कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश और उसका तिरंगा स्थायी राष्ट्रीय प्रतीक हैं। इसलिए देश की अखंडता, सामाजिक सद्भाव, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता को मजबूती प्रदान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
महफिल का सबसे भावुक और स्मरणीय क्षण उस समय आया, जब ताजुद्दीन अशअर रामनगरी के पुत्र जमजम रामनगरी द्वारा लिखित संस्मरणात्मक आलेख ‘ताजुद्दीन अशअर रामनगरी : बनारस की जीवित स्मृति’ को युवा कवि जुनैद कबीर ने अत्यंत कोमल, आत्मीय और प्रभावशाली स्वर में प्रस्तुत किया। आलेख के शब्दों में जैसे एक पूरा व्यक्तित्व धीरे-धीरे आकार लेता चला गया—एक ऐसा व्यक्तित्व जिसकी सादगी, विद्वत्ता, साहित्यिक सक्रियता और मनुष्यों से आत्मीय संबंध उसकी सबसे बड़ी पहचान थे।
कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा मानो मुशायरे की चहल-पहल थम गई हो और पूरी सभा स्मृतियों की उस शांत और नम दुनिया में प्रवेश कर गई हो, जहां अनुपस्थित व्यक्ति अपनी यादों के माध्यम से सबसे अधिक उपस्थित होता है। कई आंखें अनायास नम हो उठीं।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में अतहर जमाल लारी ने कहा कि राजनीतिक व्यस्तताओं के कारण उन्हें साहित्यकारों और शायरों के बीच बैठने तथा कविता सुनने का अवसर बहुत कम मिलता है। ऐसे में हाजी इश्तियाक अहमद के आवास पर आयोजित इस साहित्यिक आयोजन में न केवल शामिल होना, बल्कि इसकी अध्यक्षता करना भी उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज की परिस्थितियों ने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इन प्रश्नों का सामना धैर्य, संयम, पारस्परिक एकता और लोकतांत्रिक चेतना के माध्यम से ही किया जा सकता है। स्वतंत्रता असंख्य बलिदानों के बाद मिली है, इसलिए उसकी रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित रखना देश के प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
मुशायरे में बनारस और आसपास के क्षेत्रों के अलावा बाहर से आए अनेक शायरों ने अपना चुनिंदा कलाम प्रस्तुत किया। आलम बनारसी ने कहा—
“क्या खबर थी गनीम की सफ में
मेरा अपना ही यार निकलेगा।”
जमजम रामनगरी ने देश की मोहब्बत को इन पंक्तियों में अभिव्यक्त किया—
“लहद में मां की तरह मुझको भींच लेती है
वतन की खाक से जब-जब भी प्यार हमने किया।”
शम्स खालिद के इन अशआर को भी खूब सराहना मिली—
“गरीज पाऊं तो समझो न मेरी जान गलत
निकलते आए हैं मेरे सभी गुमान गलत।”
राज बनारसी, रोशन अहमद रोशन, डॉ. बख्तियार नवाज, समर गाजीपुरी, निजाम बनारसी और हाजी इश्तियाक अहमद ने भी अपनी गजलों और देशप्रेम से ओतप्रोत रचनाओं से महफिल को यादगार बना दिया। डॉ. बख्तियार नवाज का यह शेर विशेष रूप से सराहा गया—
“गुल टूट रहे हैं न चमन टूट रहा है
फिर भी मेरे सय्याद का मन टूट रहा है।”
कार्यक्रम का शुभारंभ नातख्वां ओवैस चंदौलवी की नात-ए-रसूल से हुआ। मुशायरा लगभग पांच बजे शुरू हुआ और देर रात तक चलता रहा। साहित्यप्रेमी श्रोताओं ने शायरों के हर अच्छे शेर पर खुलकर दाद दी। स्वतंत्रता दिवस की पृष्ठभूमि में अधिकांश शायरों की रचनाओं में राष्ट्रीय एकता, भाईचारा, देशप्रेम और स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों के प्रति श्रद्धा का स्वर प्रमुख रहा।
कुल मिलाकर यह आयोजन महज कविता और शायरी की एक शाम नहीं था। यह उस ऐतिहासिक चेतना को पुनर्जीवित करने का अवसर था, जिसमें आजादी केवल सत्ता-परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा, सामाजिक सद्भाव और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प है। ताजुद्दीन अशअर रामनगरी की स्मृति में आयोजित यह महफिल बनारस की उस जीवंत साहित्यिक परंपरा की भी याद दिलाती रही, जिसमें स्मृति और वर्तमान, कविता और जीवन तथा देशप्रेम और मानवीय सरोकार एक-दूसरे से अलग नहीं होते।
देर रात तक चलने वाली यह साहित्यिक शाम अपने पीछे शायरी की गूंज ही नहीं, बल्कि ताजुद्दीन अशअर रामनगरी की आत्मीय स्मृतियों और राष्ट्रीय एकता की उस गरमाहट को भी छोड़ गई, जो लंबे समय तक उपस्थित लोगों के मन में बनी रही।
इस अवसर पर डॉ एम. अकबर, असलम खलीफा, डॉ एहतेशामुल हक़, शमीम रियाज, अब्दुल्लाह बिन गफ्फार एडवोकेट, जुबैर आदिल सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, बुद्धिजीवी उपस्थित थे।




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