समृद्धि, देशभक्ति और गौरवशाली इतिहास का प्रतीक लाल दरवाज़ा
Obedurrehman siddiqui
dil india live (Ghazipur). “गाज़ीपुर के दिल में आज भी एक ऐसा ऐतिहासिक दरवाज़ा खड़ा है, जो सिर्फ़ ईंट और पत्थरों का नहीं, बल्कि समृद्धि, देशभक्ति और गौरवशाली इतिहास का प्रतीक यह है, लाल दरवाज़ा। आज यह इलाका एक साधारण बाज़ार का हिस्सा दिखाई देती है, लेकिन कभी यही गाज़ीपुर के प्रसिद्ध व्यापारी बाबू शिव सहाय की भव्य कोठी का मुख्य प्रवेश द्वार था.
बाबू शिव सहाय के पूर्वज मुरली साहू अग्रवाल अवध के नवाब आसफ़-उद-दौला के दरबार में थे। बाद में गाज़ीपुर आए और मुरली कटरा की स्थापना की, जो आज भी शहर की एक पहचान है।
इस प्रतिष्ठित परिवार के वंशज लाल दरवाज़ा, मुरली कटरा (अग्रवाल टोली) और देओढ़ी बल्लभ दास में आबाद हैं।
बाबू शिव सहाय ने गाज़ीपुर और बनारस में चीनी के व्यापार को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उस समय जनपद मे 461 चीनी मिले थी.
वर्ष 1847 में जब चीनी का संकट आया, तब उन्होंने अपनी दूरदर्शिता से इस व्यापार को नई पहचान दिलाई और पूर्वांचल के सबसे प्रतिष्ठित व्यापारियों में शामिल हो गए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान सिर्फ़ एक व्यापारी की नहीं थी, बल्कि...
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जब अंग्रेज़ क्रांतिकारियों की तलाश में थे, तब बाबू शिव सहाय ने अपनी लाल दरवाज़ा कोठी में आज़मगढ़ से आए कुछ क्रांतिकारियो को शरण दी। ऐसा करना अपनी जान जोखिम में डालने जैसा था, लेकिन देशभक्ति को सबसे ऊपर रखा।
स्थानीय इतिहास के अनुसार, आज़ादी के बाद कुछ समय तक इसी परिसर में गाज़ीपुर का प्रारंभिक बिजली घर भी संचालित हुआ, जहाँ से शहर के एक हिस्से को बिजली आपूर्ति की जाती थी - यह परिवार आगे चलकर अलग अलग आबाद हुए जो मुरली कटरा - लाल दरवाज़ा और डेवढी बल्लभदास है.
आज लाल दरवाज़े की कोठी और द्वार की पुरानी मेहराबें आज भी बीते हुए गौरव की कहानी सुनाती हैं। समय बदल गया, चेहरे बदल गए, लेकिन लाल दरवाज़ा आज भी उसी शान से खड़ा है। यह सिर्फ़ एक पुराना दरवाज़ा नहीं, बल्कि गाज़ीपुर के इतिहास, विरासत और गौरव का एक जीवंत प्रतीक है।


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