सोमवार, 9 मार्च 2026

Ramadan Mubarak 19 : जानिए क्या है 'एतेकाफ', रोजेदारों के लिए 'एतेकाफ' का क्या है हुक्म

रमज़ान के आखिरी अशरे में रखा जाता है 'एतेकाफ'


Varanasi (dil India live)। यूं तो रमजान का पूरा महीना ही इबादत के लिए खास मायने रखता है, लेकिन इसके आखिर के 10 दिन सबसे महत्वपूर्ण माने गये हैं। रमजान के आखिरी अशरे में मस्जिद में 'एतेकाफ' करना सुन्नत है। एतेकाफ पर बैठने वाले ईद का चांद देखने के बाद ही मस्जिद से अपने घर लौटते हैं। 

हदीस के मुताबिक एतेकाफ में बैठकर इबादत करने वाले लोगों के अल्लाह सभी गुनाह माफ कर देता है। एतेकाफ सुन्नते केफाया है, अगर मोहल्ले का एक शख्स भी एतेकाफ करले तो सभी के लिए यह रहमतवाला होता है। सभी बरी हो जाते हैं, अगर कोई नहीं बैठा तो पूरा मुहल्ला गुनाहगार होगा। रब का अजाब मुहल्ला झेलेगा। बहुत सारी मस्जिदों में कई लोग 'एतेकाफ' पर बैठते हैं। यही नहीं दावते इस्लामी इंडिया के लोग कंकड़िया बीर मस्जिद में पूरे मेम्बर्स ही ऐतेकाफ पर बैठते है।

मुक़द्दस रमज़ान को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला रहमत, दूसरा मगफिरत और तीसरा जहन्नुम से आजादी का अशरा । दूसरा अशरा जब मुकम्मल होता है तो एतेकाफ शुरू होता है। इसलिए तीसरा अशरा शुरू होने से पहले मोमिनीन असर की नमाज के बाद मस्जिद में एतेकाफ के लिए दाखिल हो जाते हैं। तीसरा अशरा "जहन्नुम की आग से निजात" दिलाने वाला कहा जाता है। इस अशरे में की गई इबादत के बदले अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ कर उन्हें जहन्नुम की आग से निजात दे देता है। इसी अशरे की कोई एक रात शबे कद्र होती है। इसलिए लोग रात-रात भर जाग कर इबादत करते हैं। बताते हैं कि शबे कद्र में इबादत का सवाब एक हजार रातों की इबादत के बाराबर होता है। इस रात में मांगी गई दुआओं को अल्लाह कुबूल फरमाता है।

मौलाना शफीक अजमल
(प्रमुख इस्लामी विद्वान रेवड़ी तालाब वाराणसी)





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