जानिए क्या है मदर्स डे का इतिहास, क्या है इसकी कहानी
Varanasi (dil India live). मां की दुआ लेकर जब घर से निकलते हैं, महसूस में होता है जन्नत में टहलते हैं...। मशहूर शायर अहमद आज़मी ने कभी यह कलाम अपनी मां की मोहब्बत में लिखा था मगर यह अशरार आज हर बेटे की जुबां पर है। दरअसल जब बात मां की आती है, तो मां से बेहतर कोई नहीं दिखाई देता है, यही वजह है कि मदर्स डे पर उसे या आपके जीवन की किसी भी अन्य विशेष महिला को पहचानना बहुत ज़रूरी है। आखिरकार, मां ही सब कुछ करती हैं। वे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों का जश्न मनाने में आपकी मदद करने के लिए मौजूद हैं, मुश्किल समय में सहारा देने के लिए कंधा देती हैं और बीच के हर पल में साथ देती हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपकी मां, सौतेली मां, दादी, पत्नी, बहन या बेटी को वह सारा प्यार मिले जिसकी वह हकदार हैं। एक मां का आँचल अपनी संतान के लिए कभी छोटा नहीं पड़ता। मां का प्रेम अपनी संतान के लिए इतना गहरा और अटूट होता है कि मां अपने बच्चे की खुशी के लिए सारी दुनिया से लड़ लेती है। मां का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। मां बिना ये दुनियां अधूरी है।
कब हुई मदर्स डे की शुरुआत
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मदर्स डे की शुरुआत 1870 के दशक के अंत में हुई थी,जब “बैटल हाइम ऑफ द रिपब्लिक” की लेखिका जूलिया वार्ड होवे ने गृहयुद्ध के बाद “शांति के लिए मदर्स डे” की स्थापना की वकालत की थी।
हालांकि इस विचार को कुछ लोगों ने अपनाया, लेकिन यह वास्तव में कई सालों बाद ही जड़ पकड़ पाया। तभी अन्ना जार्विस नाम की एक महिला ने अपनी मां और कार्यकर्ता, एन जार्विस को सम्मानित करने का बीड़ा उठाया, जिन्होंने होवे की तरह ही गृहयुद्ध के बाद शांति और उपचार की तलाश की थी, साथ ही अपने समुदाय में रहने की स्थिति में सुधार किया था।
मई 1905 में एन जार्विस की मृत्यु के बाद, अन्ना ने मई के दूसरे रविवार को राष्ट्रीय मातृ दिवस के रूप में घोषित करके अपनी मां के प्रयासों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने अपनी बात कांग्रेस तक पहुंचाई और 1914 में इस दिवस को आधिकारिक बना दिया गया। मां शब्द में मातृत्व है प्यार है दुलार है। मां 9 माह अपने बच्चों को अपने पेट में रखकर अपने शरीर के एक एक बूंद से सुरक्षित रखते हुए जन्म देने के बाद अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है संतान को कभी कष्ट न हो इसके लिए अपना जीवन भी कुर्बान करने का आमादा रखती है। लात खाकर भी भोजन देने का नाम है मां और जब बच्चा के पेशाब से कड़कती ठंड में विस्तर गीला हो जाता है तो वह मां ही है जो खुद गीले विस्तर पर सोकर बच्चे को सुखे विस्तर पर सुला कर रात काट लेती है।इतना धैर्य और निःस्वार्थ केवल मां बिना किसी इच्छा और लालच के करती रहती है। आज समय बदला और लोग बदले मां की ममता के सम्मान को न समझने की धारणा पनपी जिसकी पणिनीत हुई कि जिसने लाट दुलार और प्यार में जिंदगी मिटा दी उन्हीं संतानों नें मां को घर से बाहर कर अनाथालय और वृद्धाश्रम तक पहुंचा दिया। फिर भी धन्य है मां इतने के बाद भी अपनी संतान के प्रति अपार लगाव व सदा खुश रहने की दुआयें करती रहती हैं। मां के प्रति सदैव लगाव प्यार और उसकी ममता को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मातृत्व दिवस पर सभी को संकल्पबद्ध होना चाहिए कि जब मां को जब संतान की आवश्यकता हो तो उससे साथ सदैव खड़ें रहे देखभाल करें व खुशहाल रहे।
लेखक- रामाश्रय यादव
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