मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

Ramadan ka Paigham 6 : पूरे रमज़ान तरावीह की नमाज अदा करना सुन्नत

चांद देखकर तरावीह शुरू और चांद देखकर तरावीह होती है मुकम्मल



dil india live (Varanasi). चांद देखकर तरावीह शुरू होती है और चांद देखकर तरावीह मुकम्मल की जाती है। मुकद्दस रमजान में पूरे महीने जिस तरह से मोमिन को रोज़ा रखना ज़रूरी है वैसे ही उसे तरावीह की नमाज़ भी अदा करना ज़रुरी होता है। फर्क बस इतना है कि रोज़ा फर्ज़ है और तरावीह सुन्नत। इसके बावजूद तरावीह अदा करना इस्लाम में बेहद ज़रूरी करार दिया गया है, इसलिए कि तरावीह नबी-ए-करीम को बेहद पसंद थी। 

इस माहे मुबारक को अल्लाह ने अपना महीना कहा इसलिए रमज़ान को इबादत का महीना भी माना जाता है और इस महीने की बहुत ज्यादा अहमियत है। इस मुकददस महीने में मुसलमान महीने भर रोजे (व्रत) रखता है। पांच वक्त की नमाज के साथ ही खास नमाज़ "नमाजे-तरावीह" अदा करता हैं। कुछ मस्जिदों में तरावीह 4 दिन कि तो कहीं 6 दिन तो कहीं 15 व 21 दिन में अदा की जाती है। उलेमा कहते हैं कि अगर किसी ने 4 दिन की तरावीह या 15 दिन की तरावीह मुकम्मल कर ली तो वो ये न सोचे कि तरावीह उसकी हो गई। उलेमा कहते है कि तरावीह पूरे महीने अदा करना ज़रूरी है। तरावीह चांद देखकर शुरू होती है और चांद देखकर ही खत्म किए जाने का शरई हुक्म है। तरावीह में पाक कुरान सुना जाता है। अगर किसी ने 4 दिन, 7 दिन या 15 दिन या जितने भी दिन की तरावीह मुकम्मल की हो उसे सुरे तरावीह महीने भर यानी ईद का चांद होने तक अदा करना चाहिए।

रोज़े में दुआएं होती है कुबुल   
रमज़ान में देश दुनिया में अमन के लिए दुआएं व तरक्की के लिए दुआएं मांगी जाती है। दरअसल रमजान का पाक महीना इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना होता है। इस पाक महीने में लोग इबादत करके अपने रब का जहां शुक्रिया अदा करते हैं वहीं इस महीने में दुआएं कुबुल होती है।

क्या है तरावीह

 रमजान में मोमिन दिन में रोज़ा रखते हैं और रात में तरावीह की नमाज़ अदा करते है। यह नमाज़ बीस रिकात सामूहिक रुप से अदा की जाती है। इस नमाज को कम से कम 3 दिन ज्यादा से ज्यादा 30 दिन में पढ़ा जाता है जिसमें एक कुरान मुकम्मल की जाती है। खुद पैगंबर हुजूर अकरम सल्लललाहो अलैह वसल्लम ने भी नमाज तरावीह अदा फरमाई और इसे पसंद फरमाया। या अल्लाह हम सबको पूरे महीने रमज़ान की इबादत की तौफीक अता फरमा... आमीन

  मौलाना अजहरुल कादरी 
(इमामे जुमा मस्जिद टकटकपुर)

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

Ramadan ka Paigham 5 : मुक़द्दस रमज़ान में सहरी करने का भी है बड़ा सवाब

खजूर से इफ्तार और सहरी करना दोनों नबी की सुन्नत





dil india live (Varanasi)। मुकद्दस बेशुमार खूबियों वाले महीने को रमज़ान में सवाब ही सवाब और बरकतें ही बरकत अल्लाह बंदे पर निछावर करता है। कहा जाता है कि रमज़ान महीने का एक और सुन्नतों भरा तोहफा खुदा ने हमें सहरी के रूप में अता किया है। रोज़े में सहरी का बड़ा सवाब है। सहरी उस गिज़ा को कहते हैं जो सुब्ह सादिक से पहले रोज़ेदार खाता है। सैय्यदना अनस बिन मालिक फरमाते हैं कि ‘‘नबी-ए-करीम (स.) सहरी के वक्त मुझसे फरमाते कि मेरा रोज़ा रखने का इरादा है मुझे कुछ खिलाओ। मैं कुछ खजूरें और एक बर्तन में पानी पेश करता।’ इससे पता यह चला कि सहरी करना बज़ाते खुद सुन्नत है और खजूर व पानी से सहरी करना दूसरी सुन्नत है। नबी ने यहां तक फरमाया कि खजूर बेहतरीन सहरी है। 

नबी-ए-करीम (स.) इस महीने में सहाबियों को सहरी खाने के लिए खुद आवाज़ देते थे। अल्लाह और उसके रसूल से हमें यही दर्स मिलता है कि सहरी हमारे लिए एक अज़ीम नेमत है। इससे बेशुमार जिस्मानी और रुहानी फायदा हासिल होता है। इसलिए ही इसे मुबारक नाश्ता कहा जाता है। किसी को यह गलतफहमी न हो कि सहरी रोज़े के लिए शर्त है। ऐसा नहीं है सहरी के बिना भी रोज़ा हो सकता है मगर जानबूझ कर सहरी न करना मुनासिब नहीं है क्यों कि इससे रोज़ेदार एक अज़ीम सुन्नत से महरूम हो जायेगा। यह भी याद रहे कि सहरी में खूब डटकर खाना भी जरूरी नहीं है। कुछ खजूर और पानी ही अगर बानियते सहरी इस्तेमाल कर लें तो भी काफी है। 


दरअसल रमज़ान वो मुकदद्स महीना है जो लोगों को यह सीख देता है कि जैसे तुमने एक महीना अल्लाह के लिए वक्फ कर दिया सुन्नतों और नफ़्ल पर गौर किया, उस पर अमल करते रहे वैसे ही बचे पूरे साल नेकी और पाकीज़गी जारी रखो। नबी-ए-करीम (स.) ने फरमाया ‘‘तीन चीज़ों को अल्लाह रब्बुल इज्ज़त महबूब रखता है। एक इफ्तार में जल्दी, सहरी में ताखीर और नमाज़ के कि़याम में हाथ पर हाथ रखना।’ नबी फरमाते हैं कि इस पाक महीने को जिसने अपना लिया, जो अल्लाह के बताये हुए तरीकों व नबी की सुन्नतों पर चल कर इस महीने में इबादत करेगा उसे जन्नत में खुदावंद करीम आला मुक़ाम अता करेगा। यह महीना नेकी का महीना है। इबादत के साथ ही इस महीने में रोज़ेदार की सेहत दुरुस्त हो जाती है। रोज़ेदार अपनी नफ्स पर कंट्रोल करके बुरे कामों से बचा रहता है। ये महीना नेकी और मोहब्बत का महीना है। इस पाक महीने में जितनी भी इबादत की जाये वो कम है क्यों कि इसका सवाब 70 गुना तक अल्लाहतआला बढ़ा देता है, इसलिए कि रब ने इस महीने को अपना महीना कहा है। ऐ पाक परवरदिगार तू अपने हबीब के सदके में हम सबको रमज़ान की इबादत, नबी की सुन्नतों पर चलने की व रोज़ा रखने की तौफीक अता फरमा..आमीन।

     हाफिज मौलाना शफी अहमद
{सदर, अंजुमन जमात रजाए मुस्तफा, बनारस}

Yashfeen fatima ने रखा अल्लाह की रज़ा के लिए Ramadan का रोज़ा

मुफ्ती अब्दुल हन्नान की नन्हीं बेटी यशफीन ने रोज़ा रख, पेश किया मिसाल 





dil india live (Varanasi). वाराणसी के लल्लापुरा निवासी,  मशहूर आलिमे दीन व मदरसा मजीदिया के उस्ताद Mufti Abdul Hannan की नन्हीं बेटी 6 साल की Yashfeen fatima ने रमज़ान का रोज़ा रखकर मिसाल पेश किया है।‌ छोटी सी उम्र में यशफीन फातेमा के रोज़ा रखने से घर में खुशियां मनाई गई। मुफ्ती अब्दुल हन्नान कहते हैं कि बच्ची ने जिद किया तो हम लोग उसे रोज़ा रखने से मना नहीं कर सकें। क्यों कि इंसान तो महज़ कोशिश करता है रोज़ा रखवाना तो रब का काम है। रब ने ही रोज़ा रखने के लिए बच्ची के दिल में रमजान की मोहब्बत पैदा की तभी तो उसने रोज़ा रखने का इरादा किया। उन्होंने दुआएं मांगी कि या पाक परवरदिगार तू अपने हबीब के सदके में तमाम वालिदैन को यह खुशी नसीब फरमा और तमाम मुसलमानों को रमज़ान की दौलत से मालामाल कर दें... आमीन। यशफीन के परिवार से जुड़े एस एम खुर्शीद ने कहा कि रमज़ान में रब की रहमत बरसती है तभी तो कितने हट्टे कट्टे लोग सेहतमंद होकर भी रोज़ा नहीं रख पाते वहीं छोटे छोटे मासूम बच्चे भी रोज़ा कामयाबी से रख लेते हैं।

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

Md Yusuf Raza व ayesha zainab की हुई रोज़ा कुशाई

छोटी सी उम्र में दोनों बच्चों ने रखा रोज़ा कायम की मिसाल 




Varanasi (dil india live)। st. Mary's convent school कैंटोनमेंट में नर्सरी क्लास में तालीम ले रहा मोहम्मद युसूफ रज़ा और jevan jyoti higher secondary school sarnath में क्लास 2 में पढ़ रही आयशा जैनब की इतवार को रोज़ा कुशाई हुई। 

रिफ़त जहां और ज़ैद अख्तर के इन दोनों बच्चों ने छोटी सी उम्र में रोज़ा रख कर मिसाल कायम किया है। अर्दली बाज़ार के रहने वाले दोनों बच्चों ने रमज़ान का रोज़ा तो रखा ही साथ ही नमाज़ की भी पाबंदी खुशी खुशी की। मां रिफ़त कहती हैं कि अपने छोटे छोटे दोस्तों के साथ वो इस कदर खेल-खेल में मस्ती करने लगा कि रोज़ा भी है ये भूल गया। पहले दोनों बच्चों ने सहरी करने की जींद की फिर रोज़ा रख लिया। घर में किसी ने सोचा भी नहीं था कि दोनों रोज़ा रख लेंगे और दोनों की रोज़ा कुशाई करनी पड़ेगी मगर वक्त जब ज़ोहर की नमाज का हो गया तो भी दोनों रोज़ा रखने पर डटे रहे। फिर कब इफ्तार का वक्त हो गया और रोज़ा कुशाई की रस्म अदा करना पड़ा पता ही नहीं चला। इस दौरान युसुफ रज़ा और आयशा जैनब ने रब से दुआ मांगी कि, या अल्लाह वालिदैन कि रोजी-रोटी में बरकत हो जाए, मुल्क में हमेशा अमन चैन बना रहे, समाज से तमाम बुराइयां दूर हो जाए। हर बच्चा रब की रज़ा के लिए रोज़ा रखे। ...आमीन।




Ramadan ka Paigham 4: एतेकाफ कंकडिया बीर में एक माह का

यहां तो पूरे महीने ही बैठते हैं एतेकाफ पर रोजेदार






 

सरफराज/रिजवान 

dil india live (Varanasi). रमजान की खास इबादतों में शामिल एतेकाफ अमूमन रमजान के आखिरी अशरे में रहा जाता है मगर नबी ने कई बार पूरा रमजान यानी 30 दिन एतेकाफ किया था। नबी कि इसी सुन्नतों पर अमल करते हुए दावते इस्लामी हिंद के मेंबर्स मस्जिद कंकडियाबीर में पूरे रमजान एतेकाफ पर बैठते हैं। इस बार भी दावते इस्लामी इंडिया के मेंबर्स एतेकाफ पर बैठ गए हैं। पूरी मस्जिद इबादतगुजारो से भरी हुई है। एक साथ इबादत,एक साथ जमात से नमाजे अदा करना व एक साथ रोज़ा इफ्तार के साथ ही देश दुनिया में अमन और शांति के लिए दुआएं करने का नजारा देखते ही बनता है। दावते इस्लामी इंडिया के डा. साजिद अत्तारी बताते हैं कि हर साल दावते इस्लामी इंडिया के लोग एक साथ पहले ही रमजान से एतेकाफ पर बैठ जाते हैं और जब ईद का चांद होता है तो एतेकाफ पूरा करके अपने घरों को लौटते हैं।


यहां जानिए क्या है एतेकाफ
एतेकाफ सुन्नते कैफाया है। एतेकाफ का लफ्ज़ी मायने, अल्लाह की इबादत में बैठना या खुद को अल्लाह की इबादत के लिए वक्फ कर देना है। 20 रमज़ान से ईद का चांद होने तक मोमिनीन मस्जिद में खुद को अल्लाह के लिए वक्फ कर देते है। इसी इबादत का नाम एतेकाफ है। 

सुन्नत है एतेकाफ
एतेकाफ सुन्नते कैफाया है यानी मुहल्ले का कोई एक भी बैठ गया तो पूरा मुहल्ला बरी अगर किसी ने नहीं रखा तो पूरा मुहल्ला गुनाहगार होगा और पूरे मोहल्ले पर अज़ाब नाज़िल होगा।

ये कर रहे हैं सारा इंतजाम 

मुबारक अत्तारी, डाक्टर साजिद, गुलाम पीर अत्तारी, अब्दुल अज़ीम अत्तारी,मो. साबिर की देख-रेख में यह नेक काम चल रहा है।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

DAV PG College ने स्पंदन में निकाली शांति में ही समाधान पर शोभायात्रा

'युद्ध से विनाश, शांति में ही समाधान' थीम पर डीएवी के दल ने मंच पर लघु नाट्य प्रस्तुत कर खींचा सबका ध्यान




dil india live (Varanasi). काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अंतर संकाय युवा महोत्सव 'स्पंदन के शुभारंभ पर' डीएवी पीजी कॉलेज के दल ने भव्य शोभायात्रा निकाली। 'युद्ध से विनाश, शांति में ही समाधान' की थीम पर डीएवी के दल ने एमपी थियेटर के मंच पर लघु नाट्य प्रस्तुत कर सबका ध्यान आकर्षित किया। जब पूरी दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है उसमें भारत ही एक ऐसा देश है जो विश्व शांति की बात कहता है। 

शोभायात्रा में कॉलेज का 125 सदस्यीय दल शामिल हुआ। दल में सांस्कृतिक समिति की सह समन्वयक डॉ. हसन बानो, डॉ. साक्षी चौधरी, डॉ. दीपक शर्मा, डॉ. विकास सिंह, डॉ. ऋचा गुप्ता, डॉ. श्रुति अग्रवाल, डॉ. शालिनी सिंह, डॉ. शशिकांत यादवा, डॉ. मृत्युंजय प्रताप सिंह, डॉ. ऐश्वर्या उपाध्याय, डॉ. त्रिपुर सुंदरी, डॉ. गौरव मिश्रा, प्रताप बहादुर सिंह सहित अन्य सदस्य शामिल रहे।


Ramadan ka Paigham 3 : जल्द से जल्द हकदारों तक ज़कात पहुंचा दें

यहां जानिए किसे दें, किसे न दें 'जकात', जकात न देने का क्या है 'अजाब' 



Varanasi (dil india live)। इस्लाम में जकात फर्ज हैं। जकात पर मजलूमों, गरीबों, यतीमों, बेवाओं का ज्यादा हक है। ऐसे में जल्द से जल्द हकदारों तक ज़कात पहुंचा दें ताकि वह रमजान व  ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। ये ज़कात देने का सही वक्त है। जकात फर्ज होने की चंद शर्तें है। मुसलमान अक्ल वाला हो, बालिग हो, माल बकदरे निसाब (मात्रा) का पूरे तौर का मालिक हो। मात्रा का जरुरी माल से ज्यादा होना और किसी के बकाया से फारिग होना, माले तिजारत (बिजनेस) या सोना चांदी होना और माल पर पूरा साल गुजरना जरुरी हैं। सोना-चांदी के निसाब (मात्रा) में सोना की मात्रा साढ़े सात तोला (87 ग्राम 48 मिली ग्राम ) है जिसमें चालीसवां हिस्सा यानी सवा दो माशा जकात फर्ज है।

सोना-चांदी के बजाय बाजार भाव से उनकी कीमत लगा कर रुपया वगैरह देना जायज है। जिस आदमी के पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या उसकी कीमत का माले तिजारत हैं  और यह रकम उसकी हाजते असलिया से अधिक हो। ऐसे मुसलमान पर चालीसवां हिस्सा यानी सौ रुपये में ढ़ाई रुपया जकात निकालना जरुरी हैं। दस हजार रुपया पर ढ़ाई सौ रुपया, एक लाख रुपया पर ढ़ाई हजार रुपया जकात देनी हैं। सोना-चांदी के जेवरात पर भी जकात वाजिब होती है। तिजारती (बिजनेस) माल की कीमत लगाई जाए फिर उससे सोना-चांदी का निसाब (मात्रा) पूरा हो तो उसके हिसाब से जकात निकाली जाए। अगर सोना चांदी न हो और न माले तिजारत हो तो कम से कम इतने रूपये हों कि बाजार में साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना खरीदा जा सके तो उन रूपर्यों की जकात वाजिब होती है।


इन्हें दी जा सकती हैं जकात 
"ज़कात" में अफ़ज़ल यह है कि इसे पहले अपने भाई-बहनों को दें, फ़िर उनकी औलाद को, फ़िर चचा और फुफीयों को, फ़िर उनकी औलाद को, फ़िर मामू और ख़ाला को, फ़िर उनकी औलाद को, बाद में दूसरे रिश्तेदारों को, फ़िर पड़ोसियों को, फ़िर अपने पेशा वालों को। ऐसे छात्र को भी "ज़कात" देना अफ़ज़ल है, जो "इल्मे दीन" हासिल कर रहा हो। ऊपर बताये गये लोगों को जकात तभी दी जायेगी जब सब गरीब हो, मालिके निसाब न हो।

जकात का इंकार करने वाला काफिर और अदा न करने वाला फासिक और अदायगी में देर करने वाला गुनाहगार  हैं। मुसलमानों को चाहिए कि जल्द से जल्द जकात की रकम निकाल कर गरीब, यतीम, बेसहारा मुसलमान को दें दे ताकि वह अपनी जरुरतें पूरी कर लें। जकात बनी हाशिम यानी हजरते अली, हजरते जाफर, हजरते अकील और हजरते अब्बास व हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब की औलाद को देना जाइज नहीं। किसी दूसरे मजहब को जकात देना जाइज नहीं है। क्यों की ये एक मज़हबी टैक्स है। सैयद को जकात देना जाइज नहीं इसलिए कि वह भी बनी हाशिम में से है। कम मात्रा यानी चांदी का एतबार ज्यादा बेहतर हैं कि सोना इतनी कीमत का सबके पास नहीं। नबी के जमाने में सोना-चांदी की मात्रा मालियत के एतबार से बराबर थीं। अब ऐसा नहीं हैं। 

अगर आप "मालिके निसाब" हैं, तो हक़दार को "ज़कात" ज़रुर दें, क्योंकि "ज़कात" ना देने पर सख़्त अज़ाब का बयान कुरआन शरीफ में आया है। जकात हलाल और जाइज़ तरीक़े से कमाए हुए माल में से दी जाए। क़ुरआन शरीफ में हलाल माल  को खुदा की राह में ख़र्च करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है, जैसा कि क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि... "राहे ख़ुदा में माल ख़र्च करने वालों की मिसाल ऐसी है कि जैसे ज़मीन में किसी ने एक दाना बोया, जिससे एक पेड़ निकला, उसमें से सात बालियां निकलीं, उन बालियों में सौ-सौ दाने निकले। गोया कि एक दाने से सात सौ दाने हो गए। अल्लाह इससे भी ज़्यादा बढ़ाता है। जिसकी नीयत जैसी होगी, वैसी ही उसे बरकत देगा"।

डा. साजिद अत्तारी (Dr Sajid attari)

Dawate Islami India