बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

जब इस मशहूर शायर की आंखों से निकला अश्क का सैलाब

अजमेर का यादगार नातिया मुशायरा और जिगर मुरादाबादी के हालात





dil india live (Varanasi). अजमेर शरीफ़ में एक नातिया मुशायरा था। फेहरिस्त बनाने वालों के सामने यह बड़ी मुश्किल थी कि जिगर मुरादाबादी को इस मुशायरे में कैसे बुलाया जाए। वे खुले रिंद थे और नातिया मुशायरे में उनकी शिरकत आसान नहीं थी। अगर फेहरिस्त में उनका नाम न रखा जाए तो फिर मुशायरा ही क्या रह जाता। आयोजकों के बीच कड़ा मतभेद पैदा हो गया। कुछ उनके हक़ में थे और कुछ खिलाफ़।

दरअसल जिगर का मामला ही शुरू से बहुत विवादास्पद रहा था। बड़े-बड़े शैख़ और आरिफ़-बिल्लाह, उनकी शराबनौशी के बावजूद उनसे मोहब्बत करते थे। उन्हें गुनहगार तो समझते थे, मगर सुधार के योग्य। शरियत के सख़्त पाबंद उलेमा भी उनसे नफ़रत करने के बजाय अफ़सोस करते थे कि हाय, कैसा अच्छा आदमी है, किस बुराई का शिकार हो गया। आम लोगों के लिए वे एक बड़े शायर थे, लेकिन थे शराबी। इन तमाम रियायतों के बावजूद उलेमा और शायद अवाम भी यह इजाज़त नहीं दे सकते थे कि वे नातिया मुशायरे में शरीक हों।

आख़िर बहुत सोच-विचार के बाद मुशायरे के आयोजकों ने फैसला किया कि जिगर को दावत दी जानी चाहिए। यह इतना साहसिक फैसला था कि इससे बड़ा जिगर की इज़्ज़त का कोई इकरार हो ही नहीं सकता था। जब जिगर को बुलाया गया तो वे सिर से पाँव तक काँप उठे।

“मैं गुनहगार, रिंद, सियाहकार, बदनसीब — और नातिया मुशायरा! नहीं साहब, नहीं।”

अब आयोजकों के सामने यह समस्या थी कि जिगर साहब को कैसे तैयार किया जाए। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और होंठों से इनकार। नातिया शायर हमीद सिद्दीकी ने उन्हें मनाने की कोशिश की, उनके मुरब्बी नवाब अली हसन ताहिर ने प्रयास किया, लेकिन वे किसी भी हाल में राज़ी नहीं हो रहे थे। आख़िरकार असगर गोंडवी ने हुक्म दिया और जिगर ख़ामोश हो गए।

सिरहाने बोतल रखी थी, उसे कहीं छिपा दिया। दोस्तों से कह दिया कि कोई उनके सामने शराब का नाम तक न ले। दिल पर जैसे कोई ख़ंजर से लकीर-सी खींचता था, वे बे-इख़्तियार शराब की ओर दौड़ते थे, मगर फिर रुक जाते थे। लेकिन मुझे नात लिखनी है। अगर शराब का एक क़तरा भी हलक़ से उतरा, तो किस ज़बान से अपने आका की मदह लिखूँगा। यह मौक़ा मिला है तो मुझे इसे खोना नहीं चाहिए। शायद यह मेरी बख़्शिश की शुरुआत हो। शायद इसी बहाने मेरी इस्लाह हो जाए, शायद अल्लाह को मुझ पर तरस आ जाए! एक दिन गुज़रा, दो दिन गुज़र गए। वे सख़्त अज़ीयत में थे। नात के मज़मून सोचते थे और ग़ज़ल कहने लगते थे। सोचते रहे, लिखते रहे, काटते रहे, लिखे हुए को काट-काट कर थकते रहे। आख़िर एक दिन नात का मतला हो गया।

फिर एक शेर हुआ, फिर तो जैसे बारिश-ए-अनवार हो गई। नात मुकम्मल हुई तो उन्होंने सज्द-ए-शुक्र अदा किया। मुशायरे के लिए इस तरह रवाना हुए जैसे हज को जा रहे हों। जैसे कौनेन की दौलत उनके पास हो। जैसे आज उन्हें शोहरत की सिदरत-उल-मुन्तहा तक पहुँचना हो।

उन्होंने कई दिनों से शराब नहीं पी थी, लेकिन हलक़ सूखा नहीं था। इधर तो यह हाल था, दूसरी तरफ़ मुशायरा-गाह के बाहर और शहर के चौराहों पर एहतिजाजी पोस्टर लग गए थे कि एक शराबी से नात क्यों पढ़वाई जा रही है। लोग भड़के हुए थे।

अंदेशा था कि जिगर साहब को कोई नुक़सान न पहुँच जाए। यह ख़तरा भी था कि लोग स्टेशन पर जमा होकर नारेबाज़ी न करें। इन हालात को देखते हुए आयोजकों ने जिगर की आमद को ख़ुफ़िया रखा था। वे कई दिन पहले अजमेर शरीफ़ पहुँच चुके थे, जबकि लोग समझ रहे थे कि वे मुशायरे वाले दिन आएँगे।

जिगर अपने ख़िलाफ़ होने वाली इन कार्रवाइयों को ख़ुद देख रहे थे और मुस्कुरा रहे थे।

कहां फिर यह मस्ती, कहां ऐसी हस्ती

जिगर की जिगर तक ही मैख़्वारियां हैं

आख़िर मुशायरे की रात आ गई। जिगर को बड़ी सुरक्षा के साथ मुशायरे में पहुंचा दिया गया। मंच से आवाज़ उभरी—

“रईस-उल-मुतग़ज़्ज़िलीन हज़रत जिगर मुरादाबादी!” ……

इस ऐलान के साथ ही एक शोर उठ खड़ा हुआ। जिगर ने बड़े धैर्य के साथ मजमे की ओर देखा… और प्रेम से भरे स्वर में बोले—

“आप लोग मुझे हूट कर रहे हैं, या रसूल पाक की नात को—जिसे पढ़ने की सआदत मुझे मिलने वाली है और जिसे सुनने की सआदत से आप अपने आप को महरूम करना चाहते हैं?”

शोर को जैसे सांप सूंघ गया। बस यही वह विराम था, जब जिगर के टूटे हुए दिल से यह आवाज़ निकली—

एक रिंद है और मद्हत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

हां, कोई नज़र-ए-रहमत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

जो जहां था, ठहर गया। ऐसा लग रहा था जैसे उनकी ज़बान से शेर अदा हो रहा हो और क़बूलियत का परवाना अता किया जा रहा हो।

नात क्या थी—गुनहगार के दिल से निकली हुई आह थी, पनाह की ख़्वाहिश थी, आंसुओं की सबील थी, बख़्शिश का ख़ज़ाना थी। वे ख़ुद रो रहे थे और सबको रुला रहे थे। दिल नरम हो गए, मतभेद मिट गए। रहमत-ए-आलम का क़सीदा था—भला ग़ुस्से की खेती कैसे हरी रह सकती थी!

“यह नात इस शख़्स ने कही नहीं है, इससे कहलवाई गई है।” मुशायरे के बाद हर ज़बान पर यही बात थी। 

जिगर मुरादाबादी की वो नात देखें 

एक रिंद है और मद्हत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

हां, कोई नज़र-ए-रहमत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

नज़र का दामन तंग है, और जल्वों की फ़रावानी

ऐ तलअत-ए-हक़, तलअत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

ऐ ख़ाक़-ए-मदीना, तेरी गलियों के सदक़े

तू ख़ुल्द है, तू जन्नत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

इस तरह कि हर सांस इबादत में मशग़ूल हो

देखूं मैं दर-ए-दौलत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

इश्क़ के ग़म की एक नंग भी दीदार की मुन्तज़िर है

सदक़े तेरे, ऐ सूरत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

कौनेन का ग़म, याद-ए-ख़ुदा और शफ़ाअत

दौलत है यही, दौलत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

ज़ाहिर में ग़रीब-उल-ग़ुरबा फिर भी

यह आलम-शाहों से बढ़कर है सत्वत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

इस उम्मत-ए-आसी से न मुंह फेर, ख़ुदाया

नाज़ुक है बहुत ग़ैरत-ए-सुल्तान-ए-मदीना

कुछ हमको नहीं काम, जिगर, और किसी से

काफ़ी है बस एक निस्बत-ए-सुल्तान-ए-मदीना।।

(सोशल मीडिया से)

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