सोमवार, 4 अगस्त 2025

UP: Varanasi Main Bijli कर्मियों ने निजीकरण का किया विरोध

बिजली कर्मचारियों की मांग बिना संसाधन काम न कराया जाएं व उत्पीड़न की कार्रवाई रुके

Sarfaraz Ahmad 

Varanasi (dil India live)। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने सोमवार को बिजली के निजीकरण का विरोध किया। वहीं बिना संसाधन उपलब्ध कराये फेसिअल अटेंडेंस को बाध्यकारी बनाकर वेतन रोकने के विरोध में प्रबन्ध निदेशक कार्यालय भिखारीपुर पर सभा कर विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान गुस्साएं विद्युत कर्मचारियों ने कहा कि निजीकरण और उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों के वापस होने तक बिजलीकर्मियों का संघर्ष जारी रहेगा।

सभा में वक्ताओं ने बताया कि बनारस के समस्त मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता एवं अधिशासी अभियंता कार्यालय पर बिजलीकर्मी शाम पांच बजे एक साथ बिजली के निजीकरण और उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियों के विरोध में विरोध प्रदर्शन करेंगे। संघर्ष समिति ने बताया कि प्रबन्ध निदेशक को भ्रम है कि बिजलीकर्मी फेसिअल अटेंडेंस का विरोध कर रहे हैं। क्योंकि बिजलीकर्मी अपने कार्यालयों में समय से जा ही रहे हैंं। उसका विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि उसके संचालन के लिए संसाधन जैसे फेसियल अटेंडेंस लगाने हेतु मोबाईल या कैमरायुक्त कम्प्यूटर कार्यालयों में लगाने की मांग कर रहे हैं, क्या संसाधन की व्यवस्था करना प्रबन्धन की जिम्मेदारी नही है? साथ ही प्रबन्धन से पूछ रहे हैं कि क्या फील्ड में कार्यरत बिजलीकर्मी सुबह-दस बजे से पांच बजे तक का फेसिअल अटेंडेंस लगा दें तो शाम पांच बजे के बाद बन्द होने वाली लाइन का अनुरक्षण कौन करेगा।

वक्ताओं ने बताया कि 20 जून को प्रबन्ध निदेशक पुर्वांचल से संघर्ष समिति वाराणासी के पदाधिकारियों की वार्ता में यह तय हुआ था कि जब तक विद्युत कार्यालयों और उपकेंद्रों पर संसाधन उपलब्ध नही कराया जाता तब तक फेसियल अटेंडेंस को बाध्यकारी नहीं बनाया जाएगा फिर भी वेतन रोकना कतई उचित नही हैं।

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि शीर्ष प्रबन्धन की निजी घरानों के साथ मिलीभगत है और आठ माह से निजीकरण न कर पाने के कारण हताश प्रबंधन बिजली कर्मियों का लगातार उत्पीड़न कर रहा है। संघर्ष समिति ने कहा कि उत्पीड़न का उद्देश्य बिजली कर्मियों का मनोबल तोड़ना है किंतु बिजली कर्मी किसी कीमत पर निजीकरण स्वीकार नहीं करेंगे।

उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां समाप्त कराने के लिए संघर्ष समिति की मांग है कि मार्च 2023 की हड़ताल के बाद ऊर्जा मंत्री द्वारा समस्त उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियों के वापस लिये जाने के निर्देश के अनुपालन में समस्त उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां वापस ली जाएं। निजीकरण के नाम पर 55 साल की उम्र और डाउन साइजिंग के नाम पर हटाये गये सभी संविदा कर्मी बहाल किया जाय। उत्पीड़न की दृष्टि से बिजली कर्मियों के किये गये सभी ट्रांसफर निरस्त किये जाय।

फेसियल अटेंडेंस के नाम पर जून और जुलाई माह का रोका गया वेतन तत्काल बिजली कर्मियों को दिया जाय। उत्पीड़न के नाम पर स्टेट विजिलेंस की जांच कराकर शीर्ष पदाधिकारियों के विरुद्ध की गई फर्जी एफ आई आर वापस ली जाए। रियायती बिजली की सुविधा समाप्त करने की दृष्टि से धमकी देकर जोर जबरदस्ती से स्मार्ट मीटर लगाने की कार्यवाही तत्काल बन्द की जाय।

सभा की अध्यक्षता ईआरबी यादव ने एवं संचालन अंकुर पाण्डेय ने किया। सभा को राजेन्द्र सिंह,  एसके सिंह, पंकज जायसवाल, वेदप्रकाश राय, रविन्द्र यादव, रामकुमार झा, राजेश सिंह, हेमंत श्रीवास्तव, संदीप सिंह, प्रदीप कुमार, पंकज जायसवाल, दीपक गुप्ता, मनोज यादव, मनोज जायसवाल, अनिल कुमार, प्रमोद कुमार, उमेश यादव, पंकज, उदयभान दुबे आदि ने संबोधित किया।

UP K Varanasi Main School closed

12 वीं तक के सभी स्कूल 6 अगस्त तक रहेंगे बंद 

जिला विद्यालय निरीक्षक का आया आदेश 


Mohd Rizwan 

Varanasi (dil India live)। लगातार हो रही भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति को देखते हुए Varanasi k जिला विद्यालय निरीक्षक ने इंटर तक के सभी स्कूलों को बंद करने का निर्देश दिया है। इसके अनुसार जिले के सभी बोर्ड मान्यता प्राप्त प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों (सभी बोर्ड, जैसे सीबीएसई, आईसीएसई, और राज्य बोर्ड) में 5 से 6 अगस्त तक अवकाश घोषित किया गया है। यह निर्णय छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

जारी आदेश के अनुसार, बाढ़ और बारिश के कारण निचले इलाकों में स्कूलों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है, जिससे यह कदम उठाया गया। जिला विद्यालय निरीक्षक ने सभी प्रबंधन समितियों, प्रधानाचार्यों, और शिक्षकों को इस अवधि के दौरान ऑनलाइन शिक्षा या अन्य सुरक्षित विकल्पों पर विचार करने की सलाह दी है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि स्कूल परिसर में किसी भी प्रकार का नुकसान न हो।

यह अवकाश जनपद वाराणसी के सभी बोर्डों से संबद्ध विद्यालयों पर लागू होगा, जिसमें निजी और सरकारी दोनों स्कूल शामिल हैं। जिला प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे मौसम की स्थिति को देखते हुए सतर्क रहें और बच्चों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें।

UP : Varanasi K Dalmandi में लगा निः शुल्क नेत्र परीक्षण शिविर

आंखें रब की दी हुई अनमोल नेमत

Mohd Rizwan 

Varanasi (dil India live). मानवाधिकार संरक्षण मिशन द्वारा मुसाफिरखाना, दालमंडी, वाराणसी में निः शुल्क नेत्र परीक्षण शिविर का आयोजन किया गया। यह शिविर समाजसेवी रवि कुमार के सौजन्य से आयोजित किया गया। इस आई कैंप में सैकड़ों जरूरतमंद लोगों ने अपनी आँखों की जाँच करवाई। शिविर का उद्घाटन मुसाफिरखाना अध्यक्ष मासूम रज़ा और सचिव ग्यादुद्दीन खान ने किया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि आंखें रब की दी हुई अनमोल नेमत है मगर हमारी अनदेखी और खराब खान-पान से कई बार आंखों की रौशनी कम हो जाती है। वक्त रहते अगर आंखों की जांच कर ली जाए तो आंखों की कम होती रौशनी को दवा, चश्मे से रोका जा सकता है।



इस अवसर पर अब्दुल सलाम, अशफाक अली, रगुद्दीन, संजय यादव (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष), राहुल प्रजापति (जिला उपाध्यक्ष), अनुराग अग्रवाल, अवनीश मौर्य और रोशन कुमार बरनवाल (राष्ट्रीय अध्यक्ष), महिमा चौरसिया, मोहम्मद रिजवान, विपिन मिश्रा आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे। नेत्र विशेषज्ञों की टीम ने नेत्र परीक्षण किया और निःशुल्क चश्मा वितरित किया गया। इस जनकल्याणकारी पहल की लोगों ने खूब सराहना की। 

BHU: IMS निदेशक ने तथ्यों को छिपाते हुए ली नियुक्ति

IMS निदेशक शंखवार लोकायुक्त जांच के दायरे में

SN Singh

Varanasi (dil India live). इस समय बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का चिकित्सा विज्ञान संस्थान और सर सुंदर लाल अस्पताल खासा चर्चा में है, यह चर्चा उसकी चिकित्सकीय या अकादमिक उपलब्धि के लिए नहीं हो रही है, बल्कि आपसी गुटबाजी और भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को लेकर है। सिटी स्कैन और एमआरआई सेंटर की टेंडर प्रक्रिया में फर्जी जीएसटी नंबर के माध्यम टेंडर हासिल करने के चक्कर में आईएमएस बीएचयू व एसएसएल अस्पताल के बड़े अधिकारी न्यायालय के आदेश पर एफआईआर एवं  पुलिसिया जांच के दायरे में हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट का चक्कर लगाने के बाद भी गिरफ्तारी पर रोक नहीं लगी है, पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का डर सता रहा है। बीएचयू प्रशासन द्वारा गठित जांच समिति ने भी भ्रष्टाचार के आरोपों को सही पाया और कार्यवाही की संस्तुति की है।

परन्तु आईएमएस के निदेशक डॉ एस एन सँखवार इन मामलो कार्यवाही करने के बजाय दोषियों के मददगार बने हुए हैं, और उन्हें बचा रहे हैं, जिस मामले में निदेशक की भूमिका अंपायर की होनी चाहिए उसमें वे खुद पार्टी बनकर भ्रष्टाचारियों के पक्ष में बैटिंग करते हुए नजर आ रहे हैं। इससे इस मामले में शंखवार की भूमिका संदिग्ध  प्रतीत होती है।

भ्रष्टाचार और विवादों से पुराना नाता

बीएचयू अस्पताल में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर करने वाले शोध छात्र एस.एन. सिंह निदेशक सँखवार के खिलाफ सिलसिलेवार कई मामलों के साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि भ्रष्टाचार और एसएन सँखवार का चोली दामन का संबंध है। केजीएमयू में चिकित्सा अधीक्षक रहते हुए इन्होंने नियुक्तियों में भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है, जिसमें शासन द्वारा जांच में दोषी भी पाए गए हैं, उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त के यहां भी इनके ऊपर जांच लंबित है।लोकायुक्त की जांच लंबित होने के बाद भी इन्हें कैसे आईएमएस बीएचयू के पद पर नियुक्ति दी गई।

शोध छात्र शिवम सोनकर कहते हैं कि केजीएमयू में चिकित्सा अध्यक्ष रहने के दौरान जब एसएन शंखवार ने सुनियोजितभ्रष्टाचार को अंजाम दिया, भ्रष्टाचार के मामले लंबित होते हुए लोकायुक्त की जांच लंबित होते हुए इन्हें आईएमएस में नियुक्ति हेतु विजिलेंस की तरफ से अनापत्ति कैसे प्रदान की गई है। यह एक सवालिया निशान है।

छात्र नेता दिव्यांशु त्रिपाठी कहते हैं कि एसएन शंखवार इस समय भ्रष्टारियों के संरक्षक ही नहीं बल्कि खुद भ्रष्टाचार में शामिल हैं, और बीएचयू अस्पताल में अव्यवस्था के जनक भी हैं।

(लेखक शोध छात्र व स्वतंत्र पत्रकार हैं)

India Post: UP K Varanasi Mainडाक कर्मचारियों व खिलाड़ियों ने चलाया साइकिल

डाक-कर्मियों व खिलाड़ियों ने फिट इंडिया मूवमेंट को सराहा

Varanasi (dil India live). वाराणसी परिक्षेत्र के डाक कर्मचारियों व खिलाड़ियों ने फिट इंडिया मूवमेंट के अंतर्गत यूपी कालेज मुख्य गेट स्थित डाकघर से 5 कि.मी की साइकिल रेस का आगाज़ सोमवार को किया। रेस का उद्घाटन पूर्व राष्ट्रीय हाकी खिलाड़ी व वाराणसी परिक्षेत्र के डाककर्मी जगदीश शादेजा ने फ्लैग दिखा कर किया। इस अवसर पर डाक-कर्मियों व खिलाड़ियों ने फिट इंडिया मूवमेंट को सराहा।

इस अवसर पर साई के प्रभारी जगदीश द्विवेदी, अशोक यादव कुश्ती प्रशिक्षक, जितेंद्र कुमार एथलीट प्रशिक्षक, संजीव कुमार श्रीवास्तव एथलीट प्रशिक्षक, पूजा यादव, बॉक्सिंग प्रशिक्षक, जगदीश शादेजा राष्ट्रीय हाकी खिलाड़ी पोस्टमास्टर बंगाली टोला, अभिनव राय पोस्ट मास्टर महामंडल, मनीष पांडेय डाक सहायक चौबेपूर, राम रतन पांडेय डाक सहायक सारनाथ, अभिषेक पांडेय मदनपूरा, विकास राय बी.एच.यू, प्रदीप यादव, कुलभूषण तिवारी, मालवीय नगर, अतुल मौर्य, पंकज सिंह, हरिशंकर यादव, अजय यादव, सन्नी गुप्ता, विमल किशोर, रवि रंजन, नीतीश पांडेय, राकेश किरन, सदानंद, दिनेश तिवारी शामिल थे।



रविवार, 3 अगस्त 2025

Club: UP K Varanasi Main हुआ तीनों JCI का भव्य NVP VISIT

JCI के राष्ट्रीय नेतृत्व का किया गया भव्य स्वागत

Varanasi (dil India live). वाराणसी की पवित्र भूमि ने एक विशिष्ट और ऐतिहासिक आयोजन का साक्षी बनते हुए, JCI के राष्ट्रीय नेतृत्व का भव्य स्वागत किया। JCI Kashi Shiva, JCI Kashi, और JCI shivganga के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित NVP VISIT 2025 कार्यक्रम ने नेतृत्व, एकता और संगठनात्मक समर्पण की नई मिसाल कायम की।

इस अवसर पर JCI India के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने तीनों LOMs के कार्यों की सराहना करते हुए, सदस्यता, नेतृत्व विकास और समाज सेवा के प्रोजेक्ट्स पर विस्तृत चर्चा की।


कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं

इस आयोजन की मुख्य विशेषताएं यह थीं की तीनों LOMs का संयुक्त मंच था, जो संगठनात्मक एकता और समन्वय का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत कर रहा था। इस दौरान LO Presidents द्वारा गतिविधियों का प्रभावी प्रस्तुतीकरण। इस दौरान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का प्रेरणादायी मार्गदर्शन तो मिला ही साथ ही सक्रिय सदस्यों का सम्मान होने से उनका उत्साहवर्धन भी हुआ। सौहार्दपूर्ण वातावरण में भव्य स्वागत, सत्कार समारोह जहां सम्पन्न हुआ वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी सभी ने लुत्फ उठाया।

इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन व स्वागत समारोह से हुई, जिसके पश्चात तीनों LOMs द्वारा अपने-अपने कार्यों, स्थायी प्रोजेक्ट्स, सदस्य वृद्धि, सामाजिक उत्तरदायित्व और नेतृत्व विकास कार्यक्रमों का विस्तृत प्रस्तुतीकरण किया गया।

 जानिए अध्यक्षों की क्या रही प्रतिक्रिया

 JCI Kashi Shiva के अध्यक्ष मनीष श्रीवास्तव ने कहा कि “तीनों LOMs की यह संयुक्त मेज़बानी हमारे संगठन की ताकत और पारिवारिक भाव का प्रतीक है। आज का दिन प्रेरणा, दिशा और संगठनात्मक ऊर्जा का संगम रहा।”

JCI Kashi के अध्यक्ष Harshad Agarwal ने कहा कि “हम सभी ने मिलकर यह साबित कर दिया कि जब संगठन एकजुट होते हैं, तो किसी भी आयोजन को ऐतिहासिक रूप दिया जा सकता है। यह हमारी टीम भावना का प्रतीक है।”

 jci shivganga के अध्यक्ष ने कहा कि “इस कार्यक्रम ने हमारी नारी शक्ति, युवा जोश और संगठित नेतृत्व का आदर्श रूप प्रस्तुत किया। यह आयोजन हम सभी के लिए प्रेरणा बनकर रहेगा।”

 कार्यक्रम की सफलता के लिए तीनों LOMs की LGB टीमें, वरिष्ठ सदस्य, JCRT, JJ विंग्स, JCI सेनिटर्स व सभी वॉलंटियर्स ने अभूतपूर्व समर्पण दिखाया। हर छोटे से छोटे कार्य में जो अपनत्व, ऊर्जा और परिपक्वता दिखी – वही JCI की असली पहचान है। JCI India के इस राष्ट्रीय दौरे ने वाराणसी में नेतृत्व की उस ऊर्जा को जाग्रत किया है, जो आने वाले समय में सामाजिक परिवर्तन और सकारात्मक कार्यों की नई दिशा तय करेगा।

ऑपरेशन सिंदूर-अब आगे क्या ?

भारत की निवारक नीति अभी भी काफी हद तक अपरिभाषित है। कारगिल, उरी, बालाकोट और अब पहलगाम जैसी घटनाओं पर प्रतिक्रियाएँ जोरदार रही हैं, लेकिन एक स्पष्ट सार्वजनिक सिद्धांत की अनुपस्थिति रणनीतिक अस्पष्टता को जन्म देती है। यह महत्वपूर्ण है कि भारत एक स्पष्ट सुरक्षा सिद्धांत विकसित करे जो सीमा पार प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करे, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। स्वतंत्र पत्रकार K. Vishwadev Rao का पढ़ें दृष्टिकोण...


Varanasi (dil India live). पहलगाम के भयावह आतंकी हमले के बाद, भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से जिस दृढ़ता और गति के साथ प्रतिक्रिया दी, वह देश की सैन्य तत्परता का एक उल्लेखनीय उदाहरण था। इस ऑपरेशन ने भारतीय सशस्त्र बलों की दक्षता और सीमा पार जाकर हमला करने की उनकी क्षमता को प्रदर्शित किया, जिससे स्पष्ट हो गया की भारत अब अपनी सुरक्षा के साथ किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं है। पहलगाम हमले के बाद संसद में हुई बहस में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपनी कार्रवाई का जोरदार बचाव किया। सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और इसके परिणामस्वरूप भारत को दुनिया भर के देशों से मिले समर्थन को रेखांकित किया। भारत के विदेश मंत्री का मुख्य जोर इस बात पर था कि भारत अब एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी सुरक्षा पर आंच आने पर निर्णायक कार्रवाई करता है। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह हमला "पड़ोसी देश द्वारा प्रायोजित" था और भारत की जवाबी कार्रवाई "आत्मरक्षा" में की गई थी। उन्होंने ऑपरेशन की गोपनीयता और सामरिक सफलता पर जोर दिया। सरकार का यह तर्क भी सही है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में सार्वजनिक बहस से सेना का मनोबल प्रभावित हो सकता है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हानिकारक हो सकता है।

      अब सवाल यह उठता है कि, कितनी बार हम जवाबी कार्यवाही करेंगे? कितनी बार हम शांति वार्ता की पहल करेंगे? कितनी बार निर्दोष भारतियों को अपनी जान गवानी पड़ेगी ?संसद में विपक्ष ने सरकार की प्रतिक्रिया की सराहना तो की, लेकिन साथ ही कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए। विपक्ष ने एक बात तो सही कही कि सरकार केवल जवाबी कार्रवाई पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जबकि हमले को रोकने में हुई चूक पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। विपक्ष ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक मजबूत राष्ट्र की पहचान सिर्फ प्रतिक्रिया देने की क्षमता से नहीं होती, बल्कि हमलों को रोकने की उसकी क्षमता से भी होती है। राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा केवल प्रेस ब्रीफिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि संसद में इसकी गहन जांच होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

      अब गौर करें पहलगाम जैसे बड़े हमले पर तो एक बात तो कचोटती है, किसी भी संस्थागत जवाबदेही, किसी इस्तीफे या किसी परिचालन ऑडिट के सार्वजनिक होने की कोई खबर नहीं आई। यह लोकतांत्रिक पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता कमजोरी का संकेत नहीं होती, बल्कि यह एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान होती है।

      यह महत्वपूर्ण है कि राष्ट्र सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को व्यक्तियों के संकल्प के बजाय संस्थागत प्रणालियों के दृष्टिकोण से देखना चाहिए, परन्तु, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उन प्रणालियों में सुधार करना आवश्यक है जो कार्यालय में कौन है, इस पर ध्यान दिए बिना प्रभावी ढंग से कार्य करती रहें। आने वाली पीढ़ियों को एक स्पष्ट दृष्टिकोण और समझ देना भी उतना ही ज़रूरी है, जो इतिहास या विरासत में हमे मिला नहीं । हर हमले के बाद हम सोचते है की क्या किया जाए? हमला कैसे हुआ और उसे आगे होने से कैसे रोकना है इस पर भी मंथन ज़रूरी है जो पूर्व की सरकारों में नहीं किया गया।

      भारत की निवारक नीति अभी भी काफी हद तक अपरिभाषित है। कारगिल, उरी, बालाकोट और अब पहलगाम जैसी घटनाओं पर प्रतिक्रियाएँ जोरदार रही हैं, लेकिन एक स्पष्ट सार्वजनिक सिद्धांत की अनुपस्थिति रणनीतिक अस्पष्टता को जन्म देती है। यह महत्वपूर्ण है कि भारत एक स्पष्ट सुरक्षा सिद्धांत विकसित करे जो सीमा पार प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करे, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

      भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों का इतिहास हमेशा से ही जटिल रहा है, जिसमें युद्ध, तनाव और शांति प्रयासों का मिश्रण रहा है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक, हर प्रधानमंत्री ने अपने-अपने तरीके से इस चुनौती का सामना किया है। जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की उम्मीद की थी। कश्मीर पर 1947-48 के युद्ध और अन्य विवादों ने इस उम्मीद को कम कर दिया। नेहरू की नीति अक्सर "रणनीतिक संयम" और "आशावाद" पर आधारित थी। वहीँ लाल बहादुर शास्त्री ने ताशकंद घोषणा (1966) पर हस्ताक्षर किए। इस घोषणा का उद्देश्य शांति बहाल करना और पूर्व-युद्ध स्थिति पर लौटना था। इंदिरा गांधी ने शिमला समझौता (1972) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से सभी विवादों को सुलझाने का एक ढाँचा स्थापित किया। अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर घोषणा (1999) के माध्यम से, बस से लाहौर की यात्रा की, जो दोनों देशों के बीच शांति की एक प्रतीकात्मक पहल थी। कारगिल युद्ध ने इन प्रयासों को बाधित कर दिया। इसके बाद भी, उन्होंने आगरा शिखर सम्मेलन (2001) के माध्यम से शांति बहाल करने का प्रयास किया। वाजपेयी की नीति को "आतंकवाद को अस्वीकार" करते हुए "शांति की कोशिश" कहा जा सकता है। वहीँ मनमोहन सिंह सरकार ने पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने पर जोर दिया, लेकिन सीधे सैन्य कार्रवाई से परहेज किया। इस काल में शांति वार्ता अक्सर आतंकवाद के मुद्दे पर रुक जाती थी।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को आमंत्रित किया था यह सोचकर की संबंध सुधरेंगे पर उरी (2016) और पुलवामा (2019) जैसे हमलों के बाद, भारत ने अपनी नीति में एक बड़ा बदलाव किया। सर्जिकल स्ट्राइक (2016) और बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019) जैसी कार्रवाइयों ने दिखाया कि भारत अब केवल राजनीतिक दबाव पर निर्भर नहीं है, बल्कि सीमा पार जाकर आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए भी तैयार है। इस नीति को अक्सर "नया सामान्य" (New Normal) कहा जाता है, जहाँ शांति वार्ता आतंकवाद के पूर्ण खात्मे से जुड़ी है। वर्तमान मोदी सरकार अब केवल शांति वार्ता पर निर्भर नहीं है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक सैन्य कार्रवाई को भी अपने कूटनीतिक टूलकिट का हिस्सा मानती है।

पहलगाम हमले के बाद सबसे बड़ा सवाल संस्थागत जवाबदेही का है। एक बड़े हमले और सैन्य ऑपरेशन के बावजूद, किसी भी अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं की गई, न ही किसी सार्वजनिक ऑडिट की बात हुई। ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य शक्ति का एक बेहतरीन उदाहरण है। हमें अपनी प्रतिक्रियात्मक क्षमता पर गर्व करना चाहिए, लेकिन उससे इतर हमारी प्राथमिकता हमलों को होने से रोकने की होनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती अब केवल सीमा पार की चुनौतियों से नहीं, बल्कि हमारे अपने सुरक्षा तंत्र में मौजूद खामियों को दूर करने की है।