मरहूम ख़लिश मख़दूमाबादी की कृति “सोज़-ए-ख़लिश” का लोकार्पण
भाषा का लोप सांस्कृतिक क्षरण का सूचक होती है : प्रो आफताब अफ़ाक़ी
डॉ. रेशमा खातून की साहित्यिक साधना लाई रंग, लोकार्पण संग हुआ मुशायर

dil india live (Chandoli). सेंट अलहनीफ़ स्कूल, सेमरा में मशहूर शायर मरहूम ख़लीश मख़दूमाबादी के काव्य-संग्रह “सोज़-ए-ख़लिश” का लोकार्पण संपन्न हुआ। कार्यक्रम के संयोजक की भूमिका संस्थान के संचालक हाजी वसीम ने निभाई। कार्यक्रम का आगाज़ हाफ़िज़ तबरेज़ की तिलावत-ए-क़ुरआन से हुआ, जबकि अज़ीम अख़्तर की नात-ए-शरीफ़ ने समूचे माहौल को नूरानी कर दिया। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का संचालन जिला चंदौली डायट के उर्दू प्रवक्ता डॉ अज़हर सईद ने किया।
कार्यक्रम में प्रोफेसर डॉ. रेशमा खातून ने अतिथियों का पुष्प-गुच्छ, शाल एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रोफेसर नसीम अहमद (पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) की दो महत्वपूर्ण कृतियाँ “इंतिख़ाब-ए-कुल्लियात-ए-सौदा” एवं “कुल्लियात-ए-मीर” संस्थान के निदेशक हाजी वसीम को इस आग्रह के साथ भेंट की गई कि उन्हें संस्थान के पुस्तकालय में सुरक्षित स्थान प्रदान किया जाए।
काव्य-संग्रह पर अपने विचार व्यक्त करते हुए विशिष्ट अतिथि डॉ शमसुद्दीन शम्स अज़ीज़ी ने स्वीकार किया कि उन्हें अभी इस पुस्तक के अध्ययन का अवसर नहीं मिला है, किंतु उन्होंने कार्यक्रम के उपरांत विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत करने का आश्वासन देते हुए डॉ. रेशमा खातून के इस निःस्वार्थ साहित्यिक प्रयास को ‘इबादत’ की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि एक सच्चा कलाकार अपने जीवन-रस से अपनी कला का पोषण करता है, किंतु उसके निधन के पश्चात उसकी रचनाएँ प्रायः उपेक्षित रह जाती हैं, ऐसे में यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है।
विशिष्ट अतिथि मदर हलीमा स्कूल के निदेशक नोमान हसन ख़ां ने ख़लिश मख़दूमाबादी और अपने वालिद उस्ताद शायर सुलेमान आसिफ़ के गहरे रिश्तों पर रौशनी डालते हुए अतीत की साहित्यिक महफ़िलों का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि उन सभाओं में ताजुद्दीन अशअर रामनगरी, जौहर सिद्दीकी, अज़ीज़ कलीमी और अलीमुल्लाह अलीम जैसे प्रतिष्ठित शायरों की उपस्थिति नवोदितों के लिए एक विद्यालय का काम करती थी। उन्होंने डॉ. रेशमा खातून के इस प्रयास को नई पीढ़ी के लिए साहित्यिक पुनर्जागरण की संज्ञा दी।
सूफ़ी नवाज़ सईदी, जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन में तथ्य-संग्रह एवं पाठ-संशोधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ने कहा कि ख़लिश मख़दूम आबादी की शायरी में जो परिपक्वता और ऊँचाई दृष्टिगोचर होती है, वह दीर्घ साधना, गंभीर अध्ययन और उस्तादों के मार्गदर्शन का परिणाम है।
मुख्य अतिथि प्रोफेसर नसीम अहमद ने अपने उद्बोधन में कहा कि ख़लिश मख़दूम आबादी अत्यंत संकोची और मितभाषी स्वभाव के थे, जिसके कारण उनका सामाजिक दायरा सीमित रहा और उनकी रचनाएं भी पत्र-पत्रिकाओं में अपेक्षाकृत कम प्रकाशित हो सकीं। तथापि वे एक समर्थ, प्रगल्भ और सिद्धहस्त शायर थे। उन्होंने इस साहित्यिक पुनरुत्थान के लिए डॉ. रेशमा खातून को हार्दिक बधाई दी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर आफ़ताब अहमद अफ़ाक़ी (उर्दू विभागाध्यक्ष बीएचयू) ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि इस प्रकार की कृतियों का प्रकाशन यद्यपि सहज प्रतीत होता है, किंतु वस्तुतः यह अत्यंत जटिल कार्य है। विशेषतः तब, जब रचनाकार के जीवन-वृत्तांत दुर्लभ हों। उन्होंने मात्र भाषा उर्दू के प्रचार प्रसार के लिए मोहल्लों और घरों में साहित्यिक वातावरण के निर्माण की आवश्यकता पर बल देते हुए आग्रह किया कि वे अपनी बच्चों को उर्दू से जोड़ें, क्योंकि भाषा का लोप सांस्कृतिक क्षरण का सूचक होता है। उन्होंने अल्ताफ़ हुसैन हाली के ‘इस्लाह-ए-सुख़न’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कविता को नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उद्देश्यों का माध्यम बताया तथा डॉ. रेशमा खातून के लिए सम्मान-प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयास करने का आश्वासन दिया।

लोकार्पण समारोह के उपरांत एक भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मुस्लिम स्कूल के पूर्व प्रधानाचार्य आबिद हाशमी ने की, जबकि संचालन ज़मज़म रामनगरी ने किया। इस साहित्यिक गोष्ठी में नगर एवं बाह्य क्षेत्रों से पधारे लगभग दो दर्जन शायरों ने अपने काव्य-पाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। जिन प्रमुख शायरों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं, उनमें आबिद हाशमी, सलीम पूरी, अतहर बनारसी, ज़मज़म रामनगरी, ज़िया हुसैन, राज़ बनारसी, नोमान हसन ख़ां, नवाज़ सईदी, आशिक़ बनारसी, अकरम रियूसावी, रिज़वान बनारसी, क़सीम मख़दूम आबादी, सुरेश कुमार अकेला, अज़फ़र बनारसी, दानिश इक़बाल, अब्दुल रहमान नूरी तथा ओवैस चंदौलीवी विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे। कार्यक्रम के समापन पर डॉ. रेशमा खातून ने सभी शायरों को पुष्प-गुच्छ एवं शाल भेंट कर सम्मानित किया।
कार्यक्रम में सामाजिक संस्था सुल्तान क्लब के अध्यक्ष डॉ एहतेशामुल हक़, उप सचिव अब्दुर्रहमान, पूर्व कोषाध्यक्ष शमीम रियाज, बसंत वूमन्स कॉलेज की उर्दू की प्रोफेसर डॉ. तमन्ना शाहीन, राजकीय इंटर कॉलेज की उर्दू प्रवक्ता फिरदौस बानो, उर्दू टीचर अफ़्शा रूमानी की मौजूदगी ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिया।
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