रविवार, 1 मार्च 2026

Moment of Proud: इस्लाम का यह किरदार देता है दिली खुशी

तालीम की लौ से जलाये हुये चराग़ अपने ही सामने रौशन होता देखता रहा




dil india live (Varanasi). ऐसा भी होता है…“मेरी आंखें भर आईं”…जब एक उस्ताद अपनी ही तालीम की लौ से जलाये हुये चराग़ अपने सामने रौशन होता हुआ देखता है, तो उसके दिल में कैसा समंदर उठता होगा? सोचिये!

बरसों से मैं रमज़ान में तरावीह (विशेष नमाज़)पढ़ता आया हूं। लेकिन कभी उसका ज़िक्र सोशल मीडिया पर करना मुनासिब नहीं था। नमाज़ पढ़ने का दिखावा करना यूं भी अच्छा नहीं। लेकिन आज मैं अपने जज़्बात रोक नहीं पाया।

न जाने कितने बच्चे “मदर हलीमा सेंट्रल स्कूल” जेरेगूलर की चौखट से निकल कर डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, सी.ए., और कामयाब बिज़नेसमैन बने…,मगर आज जो हुआ, वह कुछ और ही था…इस बार हुस्न-ए-इत्तेफ़ाक़ देखिए-मदर हलीमा का ही एक तालिब-ए-इल्म, मेरे स्कूल का old student ‘शाहबाज’, हमारा इमामे तरावीह (तरावीह की नमाज़ पढ़ाने वाला) बन कर आगे खड़ा था…और मैं… उसका टीचर … उसके पीछे मुक़्तदी (नमाज़ी) बन कर। उसकी आवाज़ में क़ुरआन की तिलावत थी, और मेरी आंखों में रब की रहमत का मंज़र। मैने सोचा यह वही बच्चा है, जिसे कभी मैंने स्कूली सबक़ पढ़ाया था…आज उसकी आवाज़ पर मैं अल्लाह के आगे सिजदा कर रहा हूं। शायद इसे ही “मसावात” कहते हैं…जहां बड़े-छोटे का फ़र्क मिट जाता है, जहां ओहदे, उम्र और हैसियत सब पीछे रह जाते हैं, और आगे रह जाता है तो सिर्फ़ इल्म का नूर।


आज मुझे दिली खुशी हुई-मेरे स्टूडेंट्स की फ़ेहरिस्त में हाफ़िज़-ए-क़ुरआन का नाम भी शामिल हो गया। ये मेरे लिए लम्हे फ़ख़रिया ( moment of proud ) था। मेरे पढ़ाएं हुए बच्चों में कोई क़ुरआन का हाफ़िज़ बन कर मुझे नमाज़ पढ़ाएं। यही इस्लाम की ख़ूबसूरती है। जहां छोटा-बड़ा, गोरा -काला, उस्ताद- शागिर्द, अमीर-ग़रीब, अदना-आला, सब बराबर नज़र आते हैं।

अल्लाह से दुआ है इन बच्चों का हमेशा सर बलन्द रखना, मेरी ख़्वाहिश है कि मेरी ज़िंदगी में ऐसे ख़ूबसूरत मवाक़े ( अवसर ) अक्सर आयें…।      

       नोमान हसन खां   
(निदेशक मदर हलीमा सेंट्रल स्कूल ज़ेरेगूलर वाराणसी)