जगह जगह हुई मजलिसे, ख्वातीन ने उठाया ताबूत
Varanasi (dil India live). 21 मार्च 20 रमजान को हजरत अली मुश्किलकुशा की यौमे शहादत की पूर्व संध्या पर लोगों ने शहादत का गम मनाते हुए जगह-जगह मजलिसे की, मुख्य कार्यक्रम दरगाहे फतमान में क़दीमी शबेदारी का हुआ, जहां रात भर मजलिसे हुई, अंजुमनों ने नोहाख्वानी और मातम के साथ मौला अली को खिराज-ए-अकीदत पेश किया। इस क्रम में शहर की 28 अंजुमनों और 32 मस्जिदों में मौला अली का गम मनाते हुए विभिन्न क्षेत्रों में मजलिसों का आयोजन किया गया। जहां शिवाला इमामबाड़े में मजलिस हुई वहीं रिजवी हाउस में शहर भर की खवातीन ने शिरकत की और मौला का गम मनाया। ऐसे ही अर्दली बाज़ार में देर रात तक ख़्वातीन ने मजलिस के जरिए हज़रत अली की शहादत को सलाम किया। मजलिस के बाद या अली... कि सदाओं के साथ सभी ने नम आखों से मौला अली के ताबूत की जियारत की। शिया जमा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि 22 मार्च यानी 21 रमजान हज़रत अली की शहादत का दिन है। वो काबा में पैदा हुए और मस्जिद में शहीद हुए। उन्होंने बताया कि शनिवार को दो जुलूस मुकीमगंज से अंजुमन नसीरूल मोमिनीन के ज़ेरे एहतमाम, और दोषीपुरा से अजादारे हुसैनी, जाफरिया आदि अंजुमनों के ज़ेरे एहतमाम निकलेगा। आलम और ताबूत का यह जुलूस उठाया जाएगा और अपने कदमी रास्तों से होता हुआ यह जुलूस, शाम 5:30 से 6:०० के बीच इफ्तार के पहले सदर इमामबाड़े पहुंचेगा जहां पर हजारों की संख्या में मौजूद मर्द और खवातीन जियारत के लिए एकत्रित रहेंगे और यहां कदीमी इफ्तार का भी आयोजन होगा। फरमान हैदर ने बताया कि ईमान की शहादत 1406 साल पहले इराक़ के कूफ़ा शहर में हुई थी।
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हज़रत अली की ऐसे हुई शहादत
मस्जिद में सुबह के वक्त अब्दुल रहमान इब्ने मुलजिम ने जहरीली तलवार से हज़रत अली के सर पर वार किया था। आप दो दिन शदीद जख्मी रहे और 21 रमजान सन 40 हिजरी को इमाम की शहादत हो गई। दुनिया में हर कोई चाहे वह मुसलमान हो हिंदू हो या सिख हो, वह मौला अली से मोहब्बत करता है इसलिए की मौला अदलो इंसाफ के पैकर थे। मौला अली ने ऐसी हुकूमत की के जिस हुकूमत में कोई गरीब कभी भूखा नहीं सोया। इमाम ने दुनिया को पैगाम दिया कि देखो हुकूमत ऐसे भी की जा सकती है कि जिसमें हर इंसान के हक़ का ख्याल रखा जाए।
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