शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ईसाई और मुस्लिम रोज़ा चल रहा साथ साथ

रमज़ान का पहला अशरा "रहमत" का मुकम्मल, मगफिरत का अशरा शुरू 

dil india live (Varanasi). मुक़द्दस रमज़ान का पहला अशरा "रहमत" का शनिवार को मुकम्मल हो गया। रहमत का अशरा पूरा होते ही रमज़ान का दूसरा मगफिरत का अशरा शुरू हो गया। पहले अशरे में रब बंदों पर रहमतें नाजिल फ़रमाता है। तो दूसरे अशरे में अल्लाह अपने नेक बंदों की गुनाहों को माफ कर देता है। तीसरा और आखिरी अशरा जहन्नम से आजादी का 21 रमज़ान से शुरू होगा। आखिरी अशरे में अल्लाह अपने नेक बंदों को जहन्नुम से आजाद कर देता है।

जो लोग रमज़ान के तीनों अशरे में कामयाबी से रोज़ा रखते हैं रब उन्हें जन्नत में आला मुकाम देता है। रोजेदारों के लिए जन्नत सजाया जाता है। जन्नत का एक खास दरवाजा बाबे रययान है उलेमा फ़रमाते हैं कि उस दरवाजे से केवल रोजेदारों को जन्नत में दाखिल किया जाएगा।

मुस्लिम रोजों के साथ ही साथ ईसाई रोज़ा जिसे चालीसा या यहां उपवास काल कहा जाता है अपने रफ्तार पर है। शनिवार को महा उपवास काल के भी दस रोज़े पूरे कर लिए गए। सेंट मैरीज महागिरजा, तेलियाबाग सीएनआई चर्च, लाल गिरजाघर, सेंट पॉल चर्च, सिगरा, सेंट थॉमस चर्च गौदोलिया, राम कटोरा चर्च, ईसीआई चर्च सुंदरपुर आदि से जुड़े मसीही समुदाय ने अपना दसवां उपवास पूरा किया। इस दौरान प्रार्थना सभा और मसीही गीत गाए गयें।

 

 

Ramadan ka Paigham 10 : सभी मजहबों में मिल्लत बांटता माहे रमज़ान

सौहार्द और मोहब्बत की दावत देता रमज़ान का रोज़ा



dil india live (Varanasi)। मुकद्दस रमज़ान का महीना हिन्दू-मुस्लिम एकता और सौहार्द की मिसाल है। रमजान के रोज़े के बहाने एक दस्तरखान पर दोनों कौम के लोग एक-दूसरे के जहां नज़दीक आते हैं, वहीं मुस्लिम कल्चर और तहज़ीब में वो टोपी, कुर्ता पहन कर इस तरह से घुल मिल जाते हैं कि उनमें यह पहचान करना मुश्किल हो जाता है कि कौन मुस्लिम है या कौन हिन्दू। यही नहीं बहुत से ऐसे हिन्दू हैं जो रोज़ा रखते हैं, बहुत से ऐसे गैर मुस्लिम है जो रोज़ा रखने के साथ ही साथ मुस्लिम भाईयों को रोज़ा इफ्तार की दावत देते हैं। ये सिलसिला रमज़ान के बाद बंद नहीं होता बल्कि ये पूरे साल किसी न किसी रूप में हिंदुस्तान में जारी रहता है, चाहे वो ईद हो बकरीद हो, क्रिसमस, गुरु पर्व, दशहरा, दीपावली व होली आदि पर्व। इन त्योहारों को तमाम मजहबों के लोग एक साथ मनाते हैं। पता ये चला कि हक़ की जिन्दगी जीने की रमज़ान हमें तौफीक देता है। आखिर क्या वजह है कि रमज़ान में ही इतनी इबादत की जाती है? दरअसल इस महीने को अल्लाह ने अपना महीना करार दिया है, रब कहता है कि 11 महीना बंदा अपने तरीक़े से तो गुज़ारता ही हैतो एक महीना माहे रमज़ान को वो मेरे लिए वक्फ कर दे। यही वजह है कि एतेकाफ से लेकर तमाम इबादतों में सोने को भी रब ने इबादत में शामिल किया है। 

ऐ मेरे पाक परवर दिगारे आलम, तू अपने हबीब के सदके में हम सब मुसलमानों को रोज़ा रखने, दीगर इबादत करने, और हक की जिंदगी जीने की तौफीक दे और हम सबकी हर नेक तमन्ना व जायज़ ख्वाहिशात को पूरा कर दे..आमीन।

       डाक्टर एहतेशमुल हक 
(अध्यक्ष सुल्तान क्लब वाराणसी)
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Ramadan ki khas namaz तरावीह कई मस्जिदों में हुई मुकम्मल

कुरान हुई मुकम्मल, सूरे तरावीह पूरे रमज़ान अदा करना जरूरी-मुफ्ती अब्दुल हन्नान 



Mohd Rizwan

Varanasi (dil India live).वाराणसी की विभिन्न मस्जिदों में नमाजे तरावीह में कुरान मुकम्मल होना जारी है। शिवाला रोड पर मस्जिद हज़रत रहीम खां में हाफीज सैय्यद मुज़म्मिल ने जब तरावीह के आखिरी पारे की आखिरी सुरे मुकम्मल की तो सलाम व नमाज़ के बाद उनका जोरदार इस्तेकबाल किया गया। सैयद जावेद अली, सैयद साजिद अली, सैयद राशिद अली, अफसर खां आदि लोगों ने हाफीज सैय्यद मुज़म्मिल को फूल मालाओं से लाद दिया। इस दौरान लोगों ने हाफ़िज़ साहब की हौसला अफजाई की। ऐसे ही शनिवार को मस्जिद जाहिद शहीद पठानी टोला में हाफ़िज़ हाफ़िज़ इमामुद्दीन ने तरावीह मुकम्मल कराई। इस मौके पर उनकी जोरदार गुलपोशी की गई। सलाम और दुआओं के बाद लोगों में तबर्रूक तकसीम किया गया।





इससे पहले मस्जिद अल कुरैश फाटक शेख सलीम में हाफिज इरफान ने तरावीह मुकम्मल कराई। इस मौके पर हाफ़िज़ इरफान का ज़ोरदार इस्तेकबाल किया गया। लोगों ने उनकी गुलपोशी की। तरावीह मुकम्मल होने पर मुफ्ती अब्दुल हन्नान ने लोगों से अपील किया कि तरावीह में कुरान भले ही मुकम्मल हो गई मगर तरावीह पूरे रमज़ान भर पढ़ना जरूरी है। इसलिए ईद का चांद होने तक अपनी अपनी मस्जिदों में सूरे तरावीह जारी रखें। ऐसे ही अर्दली बाजार छोटी मस्जिद, मस्जिद जलालीपुरा, मस्जिद लल्लापुरा, बजरडीहा आदि में भी तरावीह की नमाज मुकम्मल हुई। तरावीह के बाद लोगों में तबर्रूक तकसीम किया गया। तरावीह के द्वारा विभिन्न मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में काफी चहल-पहल दिखाई दी।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

UP k Varanasi Main अदा की गई रमज़ान के दूसरे जुमे की नमाज

या रब हम सबको पांचों वक्त का नमाज़ी बना दे...आमीन

जुमे की नमाज में अमन और मिल्लत की गूंजीं सदाएं






Mohd Rizwan 

Varanasi (dil India live). मुक़द्दस रमजान के दूसरे जुमे को मस्जिदों में नमाजियों का जहां हुजूम उमड़ा वहीं मस्जिदों, इबादतगाहों का माहौल नूरानी नज़र आया। इस दौरान लोगों ने रब से दुआएं मांगी। इस्लाम में जुमे के दिन को छोटी ईद के तौर पर मनाया जाता है और रमजान के महीने में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन मस्जिदों में विशेष जुमे की नमाज अदा की गई और लोगों ने एक-दूसरे से मुसाफा कर जुमे की मुबारकबाद दी। 

मस्जिद याकूब शहीद नगवां में हाफ़िज़ मोहम्मद ताहिर, मस्जिद लाटशाही में हाफ़िज़ हबीबुर्रहमान, मस्जिद उल्फत बीबी में हाफ़िज़ साकिब रज़वी, मस्जिद ढ़ाई कंगूरा में हाफ़िज़ नसीम अहमद बशीरी, मस्जिद दायम खां में हाफ़िज़ नसीर, मस्जिद शक्कर तालाब में मौलाना मोइनुद्दीन अहमद फारूकी प्यारे मियां, मस्जिद लंगड़े हाफ़िज़ में मौलाना वलीउल्ला आरिफ, मुगलिया मस्जिद बादशाह बाग में मौलाना हसीन अहमद हबीबी ने नमाज़ के पहले तकरीर कर रमज़ान की जहां फजीलत बयां किया वहीं नमाजे जुमा के बाद दुआ में उन्होंने रब से मुल्क में अमन मिल्लत और रोज़गार में तरक्की के साथ ही नमाजियों को पांचों वक्त का पक्का सच्चा नमाज़ी बनाएं जाने की रब से दुआएं मांगी। 

ऐसे ही मस्जिद अलकुरैश, मस्जिद ताराशाह, कपड़ा मार्केट, मस्जिद लाटसरैया, शिया जामा मस्जिद दारानगर, मस्जिद लंगडे हाफिज, मस्जिद ज्ञानवापी, मस्जिद उल्फत बीबी विद्यापीठ, मस्जिद कम्मू खां, जामा मस्जिद नदेसर, मस्जिद हबीबीया गौरीगंज, मस्जिद नयी बस्ती गौरीगंज, खजूर वाली, मस्जिद बड़ी काजी सादुल्लाह पुरा, मस्जिद कमनगढहा, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद नयी बस्ती, मस्जिद खाकी शाह बाबा, मस्जिद बुलाकी शहीद, मस्जिद बाबा फरीद, मस्जिद सुग्गा गढही, मस्जिद अस्तबल शिवाला, मस्जिद जलालीपुरा, मस्जिद लाट सरैया, मस्जिद भोले शाह दीवान, मस्जिद वरुणा पुल आदि मस्जिदों सैकड़ों मस्जिदों में जुमे की नमाज अकीदत के साथ अदा की गई। नमाज के बाद दुआएं और मुसाफा किया गया।

Ramadan ka Paigham 9: तीन अशरों में बटा है "माहे रमज़ान"

रहमत का दस रोज़ा पूरा होते ही शुरू होगा मगफिरत का अशरा




dil india live (Varanasi)। मुकद्दस रमज़ान केवल कोई पर्व या त्योहार का महज नाम ही नहीं है बल्कि रमज़ान नाम है उस इस्लामिक सिस्टम और सिद्धांत का जिस पर अमल करके एक रोजेदार अपनी जिंदगी संवारता है। यही वजह है कि रमज़ान को दस दस दिन के तीन हिस्सों में बांटा गया है। जिसे अशरा कहते हैं। 

पहला अशरा रहमत का, दूसरा आशरा मगफिरत और तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का होता है। "अशरा" दस दिन को कहते हैं। कहा जाता है कि रहमत के पहले दस दिन रोज़ादारों पर रब अपनी रहमत बरसाता है। फिर दस दिन मगफिरत का होता है जिसमें अल्लाह रोज़ेदारों की गुनाह माफ कर देता है यानी मगफिरत फरमाता है। इसके बाद रमज़ान के आखिरी अशरे में अल्लाह रोज़ेदारों को जहन्नुम से आज़ाद कर देता है।जो रमजान का पूरा रोजा रखेगा, तीसो दिन रोजा रखने में कामयाब रहेगा। उसे जहन्नम की आग नहीं खा पाएगी और उसे जन्नत में दाखिल किया जाएगा। रोजेदारों के लिए जन्नत में एक खास दरवाजा बाबे रययान होगा, जिसमें से केवल रोजेदार ही जन्नत में दाखिल होंगे। रमजान के तीन अशरो को जिसने भी कामयाबी से पूरा किया, जैसा कि रब चाहता है तो वो रोज़ेदार जन्नत का हकदार होगा। रब उसे जहन्नुम से आजाद कर देगा।

कल शुरू होगा मगफिरत का अशरा 

मुक़द्दस रमज़ान का नौ रोज़ा आज मुकम्मल हो गया। कल रमज़ान की रहमत का अशरा पूरा हो जाएगा। रमजान का रहमत का सफर पूरा होने के साथ ही इस माहे मुबारक का दूसरा अशरा मगफिरत शनिवार को शुरू हो जाएगा।

 

        एस.एम खुर्शीद 

(सदर इस्लामिक फाउंडेशन आफ इंडिया)

 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

DAV PG College Varanasi के विरासत फोरम में हुई आज की राजनीति पर चर्चा

विद्यार्थियों को समसामयिक विषयों पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की दी प्रेरणा




dil india live (Varanasi). डीएवी पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग के अकादमिक फोरम विरासत द्वारा गुरुवार को आज की राजनीति और भविष्य का भारत विषय पर वाद-विवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में समसामयिक राजनीतिक परिदृश्य के प्रति जागरूकता, तार्किक चिंतन एवं लोकतांत्रिक संवाद की भावना को प्रोत्साहित करना था। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. विनोद कुमार चौधरी ने लोकतांत्रिक मूल्यों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों को समसामयिक विषयों पर गंभीर अध्ययन एवं संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दी।

वाद-विवाद में विद्यार्थियों ने पक्ष और विपक्ष दोनों दृष्टिकोणों से अपने विचार प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए। वर्तमान राजनीति की चुनौतियाँ, युवाओं की भूमिका, लोकतांत्रिक आदर्शों की प्रासंगिकता तथा भविष्य के भारत की दिशा जैसे मुद्दों पर सारगर्भित तर्क रखे गए।

इनकी रही खास मौजूदगी 

कार्यक्रम का संयोजन विरासत फोरम के समन्वयक डॉ. शोभनाथ पाठक, संचालन डॉ. प्रतिभा मिश्र एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवनारायण ने दिया। इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉ.संजय कुमार सिंह, डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह,  डॉ. शशिकांत यादवा उपस्थित रहे। छात्र प्रिंस पाण्डेय, विशाल महतो, दीपक यादव, आंचल आदि ने विचार रखे।

Ramadan ka Paigham 8 : इबादत की कसरत का महीना है रमज़ानुल मुबारक

रहमत, बरकत संग मगफिरत का सबब बनकर आता है रमज़ान 





Varanasi (dil india live)। रमज़ान की नेमतों और रहमतों का क्या कहना। रमज़ान का रोज़ा रोज़ेदारों के लिए रहमत व बरकत का सबब बनकर आता है। इसमें तमाम परेशानियां और दुश्वारियां बंदे की दूर हो जाती हैं। नेकी का रास्ता ऐसे खुला रहता है कि फर्ज़ और सुन्नत के अलावा नफ्ल इबादत और मुस्तहब इबादतों की भी बंदा कसरत करता है। रोज़ा कितनी तरह का होता है इसे कम ही लोग जानते हैं। तो रमज़ान के रोज़े को तीन तरह से समझे। मसलन पहला, आम आदमी का रोज़ा: जो खाने पीने और जीमाह से रोकता है। दूसरा खास लोगों का रोज़ा: इसमें खाने पीने और जीमाह के अलावा अज़ा को गुनाहों से रोज़ेदार बचाकर रखता है, मसलन हाथ, पैर, कान, आंख वगैरह से जो गुनाह हो सकते हैं, उनसे बचकर रोज़ेदार रहता है। तीसरा रोज़ा खवासुल ख्वास का होता है जिसे खास में से खास भी कहते हैं। वो रोज़े के दिन जिक्र किये हुए उमूर पर कारबन भी रहते हैं और हकीकतन दुनिया से अपने आपको बिलकुल जुदा करके सिर्फ और सिर्फ रब की ओर मुतवज्जाह रखते हैं। रमज़ान की यह भी खसियत है कि जब दूसरा अशरा पूरा होने वाला रहता है तो, 20 रमज़ान से ईद का चांद होने तक मोमिनीन मस्जिद में खुद को अल्लाह के लिए वक्फ करते है। जिसका नाम एतेकाफ है। एतेकाफ सुन्नते कैफाया है यानि मुहल्ले का कोई एक भी बैठ गया तो पूरा मुहल्ला बरी अगर किसी ने नहीं रखा तो पूरा मुहल्ला गुनाहगार। पूरे मोहल्ले पर अज़ाब नाज़िल होगा। रमज़ान में एतेकाफ रखना जरूरी। एतेकाफ नबी की सुन्नतों में से एक है। एतेकाफ का लफ्ज़ी मायने, अल्लाह की इबादत के लिए वक्फ कर देना। एतेकाफ अल्लाह रब्बुल इज्ज़त को राज़ी करने के लिए रोज़ेदार बैठते है। एतेकाफ सुन्नते रसूल है। हदीस व कुरान में है कि हजरत मोहम्मद रसूल (स.) ने कहा कि एतेकाफ खुदा की इबादत में रोज़ेदार को मुन्हमिक कर देता है और बंदा तमाम दुनियावी ख्वाहिशात से किनारा कर बस अल्लाह और उसकी इबादतों में मशगूल रहता है। इसलिए जिन्दगी में एक बार सभी को एतेकाफ पर बैठना चाहिए। या अल्लाह ते अपने हबीब के सदके में हम सबको रोज़ा रखने और दीगर इबादतों को पूरा करने की तौफीक दे।..आमीन।

         हाजी फारुख खां  
(जनरल सेक्रेटरी "इसरा" अर्दली बाजार वाराणसी)