आदर्श चरित्रों के अनुशीलन से होगा राष्ट्र निर्माण- मिथिलेशनंदिनी
सेवाज्ञ संस्थानम्, काशी द्वारा ‘महामना महोत्सव पखवाड़ा’ का भव्य समापन
dil india live (Varanasi). मिथिलेशनंदिनी शरण महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि आदर्श यह नहीं बताता कि क्या होना चाहिए, बल्कि यह बताता है कि हम वास्तव में कैसे हैं। आदर्श का एक पर्याय ‘दर्पण’ है, जिसमें हम स्वयं को देखते हैं। इसी प्रकार महामना जी के चरित्र को आत्मसात कर हमें अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि साधनहीनता और अनेक बाधाओं के बावजूद महामना जी ने महासेतु के निर्माण की तरह काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना कर एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि आधुनिक होने का अर्थ परंपराओं का विनाश नहीं, बल्कि उन्हें आत्मसात करते हुए आगे बढ़ना है। राष्ट्र निर्माण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा गया कि राष्ट्र एक समेकित जीवन-बोध है, जिसमें साझा कल्याण की भावना निहित होती है। विश्वास की एकता और चरित्र-बल के समन्वय से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। स्वराज, स्वदेशी और स्वशिक्षा महामना मालवीय के चिंतन के मूल आधार थे, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
सेवाज्ञ संस्थानम्, काशी द्वारा आयोजित महामना महोत्सव पखवाड़ा का समापन आज पुरस्कार वितरण समारोह के साथ गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर विद्वानों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। समापन समारोह में संस्थान के राष्ट्रीय सचिव श्री माधव झा ने सेवाज्ञ संस्थानम् के उद्देश्यों, विचारधारा तथा संगठनात्मक संरचना पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में सक्रिय संस्था की राज्य इकाइयों के कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि सेवाज्ञ संस्थानम् राष्ट्र निर्माण के व्यापक लक्ष्य के साथ निरंतर कार्यरत है। इसके साथ ही उन्होंने युवा धर्म संसद एवं उतिष्ठ भारत कार्यक्रम जैसी पहलों की भी जानकारी दी।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष प्रो. अवधेश प्रधान ने महामना मदन मोहन मालवीय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रो. प्रधान ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महामना जी के अथक प्रयासों का सजीव वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मालवीय जी एक प्रखर वक्ता, उत्कृष्ट शिक्षक, कुशल वकील और निर्भीक पत्रकार थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी महामना जी अनेक भाषाओं के जानकार थे तथा वे मानसिक शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक सौष्ठव पर भी विशेष बल देते थे। उनके विचारों में अध्ययन के साथ खेलकूद, व्यायाम और सर्वांगीण विकास को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
पूज्य महाराज मिथिलेशनंदिनी शरण ने अपने उद्बोधन में कहा कि आदर्श यह नहीं बताता कि क्या होना चाहिए, बल्कि यह बताता है कि हम वास्तव में कैसे हैं। आदर्श का एक पर्याय ‘दर्पण’ है, जिसमें हम स्वयं को देखते हैं। इसी प्रकार महामना जी के चरित्र को आत्मसात कर हमें अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि साधनहीनता और अनेक बाधाओं के बावजूद महामना जी ने महासेतु के निर्माण की तरह काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना कर एक ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया।
वक्ताओं ने इस बात पर भी बल दिया कि आधुनिक होने का अर्थ परंपराओं का विनाश नहीं, बल्कि उन्हें आत्मसात करते हुए आगे बढ़ना है। राष्ट्र निर्माण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा गया कि राष्ट्र एक समेकित जीवन-बोध है, जिसमें साझा कल्याण की भावना निहित होती है। विश्वास की एकता और चरित्र-बल के समन्वय से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। स्वराज, स्वदेशी और स्वशिक्षा महामना मालवीय के चिंतन के मूल आधार थे, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
उल्लेखनीय है कि विगत 25 दिसंबर से सेवाज्ञ संस्थानम् की काशी क्षेत्र इकाई द्वारा रक्तदान शिविर,विज्ञान प्रदर्शनी, भाषण प्रतियोगिता, निबंध लेखन एवं चित्रकला समेत 8 प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, जिनमें बड़ी संख्या में 50 से अधिक विद्यालयों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। समापन समारोह में इन प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए।
इस अवसर पर संस्था द्वारा प्रकाशित पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसमें महामना मदन मोहन मालवीय के जीवन, विचार और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री संकलित है। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र निर्माण के संकल्प और महामना के आदर्शों को जीवन में उतारने के आह्वान के साथ किया गया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष, काशी महानगर इकाई के संयोजक शिवम् पाण्डेय, शोला पटेल, सुयश दहौलिया आदि अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।


















